सुहावने मौसम और वर्षा ऋतु के बीच अगस्त का महीना आते ही गाँव के प्राथमिक विद्यालय में 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस की तैयारियाँ बहुत ही धूमधाम से शुरू हो गई थीं। स्कूल के पूरे परिसर को रंग-बिरंगी झालरों और तिरंगे गुब्बारों से सजाया जा रहा था। बच्चे देश भक्ति के गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभ्यास कर रहे थे।
इसी स्कूल में ‘आरव’ नाम का एक बहुत ही होनहार, समझदार और जिज्ञासु बालक पढ़ता था। आरव हमेशा अपनी कक्षा में अव्वल आता था और उसे देश के इतिहास तथा महापुरुषों के बारे में जानने की बहुत तीव्र लालसा रहती थी। 14 अगस्त की शाम जब आरव स्कूल से घर लौटा, तो उसके हाथ में कपड़े का बना एक सुंदर सा तिरंगा झंडा था। वह झंडे को बहुत ही आदर और सावधानी से संभालते हुए घर के आंगन में आया।
घर के आंगन में आरव के दादाजी अपनी पुरानी आरामदायक कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। दादाजी आजादी के समय बहुत छोटे थे और उन्होंने अपने पूर्वजों से स्वतंत्रता संग्राम की कई अमर गाथाएं सुनी थीं। आरव दौड़कर दादाजी के पास गया और अपने हाथ का तिरंगा दिखाते हुए बोला, “दादाजी! देखिए, आज स्कूल में मुझे यह तिरंगा झंडा मिला है! कल 15 अगस्त है और हमारे स्कूल में ध्वजारोहण होगा। लेकिन दादाजी, हम हर साल 15 अगस्त को इतना बड़ा उत्सव क्यों मनाते हैं? और इस तिरंगे झंडे के तीनों रंग हमें क्या संदेश देते हैं?”
दादाजी के चेहरे पर एक स्नेहमयी मुस्कान तैर गई। उन्होंने आरव को अपने पास बैठाया और बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा आरव! तुम्हारा यह सवाल हर भारतीय बच्चे के लिए जानना बहुत जरूरी है। 15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह वह ऐतिहासिक दिन है जब हमारा पूरा देश एक होकर अपनी आजादी का पर्व मनाता है।”
दादाजी ने आरव को विस्तार से समझाते हुए कहा, “आज से लगभग सौ-सवा सौ साल पहले हमारा भारत देश अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। ब्रिटिश शासन हमारे देश के लोगों पर बहुत अत्याचार करता था। भारतवासियों को अपने ही देश में आजादी से जीने, बोलने और शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था। उस काले दौर में देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए महात्मा गांधी, शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान और रानी लक्ष्मीबाई जैसे हजारों-लाखों देशभक्तों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।”
दादाजी की आँखें भावुक हो गईं। उन्होंने आगे कहा, “अनगिनत वीरों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। हजारों देशभक्तों ने लाठियाँ खाईं और सालों तक जेल की काल कोठरियों में यातनाएँ सहीं। आखिरकार इन महान सपूतों के अथक संघर्ष और बलिदान के बल पर 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आजाद हुआ। इसीलिए हर साल 15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं और उन अमर शहीदों को नमन करते हैं।”
आरव बहुत ही ध्यान से दादाजी की बातें सुन रहा था। उसने उत्सुकता से पूछा, “दादाजी, हमारे राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया, सफेद और हरा रंग ही क्यों है? और बीच में बने इस नीले चक्र का क्या मतलब है?”
दादाजी ने तिरंगे की ओर संकेत करते हुए बड़े ही गर्व से बताया:
1. **केसरिया रंग (Saffron):** यह रंग साहस, शौर्य, त्याग और निस्वार्थ बलिदान का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि देश की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए।
2. **सफेद रंग (White):** यह रंग शांति, सत्य, पवित्रता और ईमानदारी का प्रतीक है। यह हमें देश में आपसी भाईचारे और शांति बनाए रखने का संदेश देता है।
3. **हरा रंग (Green):** यह रंग विश्वास, हरियाली, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक है। यह हमारी धरती माँ की खुशहाली और विकास को दर्शाता है।
4. **अशोक चक्र (Ashok Chakra):** झंडे के बीच में बना 24 तीलियों वाला नीला अशोक चक्र हमें 24 घंटे निरंतर प्रगति और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि गति ही जीवन है और रुक जाना मृत्यु के समान है।
दादाजी की ये बातें सुनकर आरव का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसे अपने भारतीय होने और अपने तिरंगे पर असीम गर्व महसूस हुआ।
अगली सुबह 15 अगस्त को आरव तड़के उठकर अपनी साफ़-सुथरी स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर तैयार हो गया। स्कूल में चारों तरफ देशभक्ति की गूँज थी। मुख्य अतिथि ने सम्मानपूर्वक राष्ट्रध्वज फहराया। सभी बच्चों और शिक्षकों ने तिरंगे को सलामी दी और एक स्वर में “जन गण मन…” राष्ट्रगान गाया। पूरा वातावरण “भारत माता की जय!” और “वंदे मातरम!” के गगनभेदी नारों से गुंजायमान हो उठा।
कार्यक्रम के अंत में आरव ने मंच पर जाकर स्वतंत्रता दिवस पर एक बहुत ही ओजस्वी भाषण दिया। उसने अपने भाषण में दादाजी द्वारा बताई गई बातों को साझा किया और सभी बच्चों से अपील की कि हमें केवल ध्वजारोहण के दिन ही देशभक्त नहीं बनना है, बल्कि हर दिन देश को स्वच्छ रखकर, लगन से पढ़ाई करके और गरीबों की मदद करके एक सच्चा और जिम्मेदार नागरिक बनना है।
सभी शिक्षकों और बच्चों ने तालियों की गड़गड़ाहट से आरव का उत्साहवर्धन किया। घर लौटकर आरव ने दादाजी को सारी बात बताई। दादाजी ने गर्व से आरव को गले से लगा लिया।