एक सुंदर वन में एक मधुर आवाज़ वाला बुलबुल पेड़ की ऊँची डाली पर घोंसला बनाकर रहता था। उसी जंगल में एक चालाक और दुष्ट जंगली बिल्ली भी रहती थी। वह बुलबुल को खाने के उपाय ढूँढ़ती रहती थी, लेकिन ऊँची डाली तक पहुँच नहीं पाती थी।
एक दिन बिल्ली पेड़ के नीचे आई और मीठी आवाज़ में बोली, “ओ प्यारे बुलबुल! तुम्हारा गीत सुनकर मैं मंत्रमुग्ध हो गई हूँ। नीचे आओ न, हम सहेलियाँ बन जाएँ और साथ में गाएँ।”
चतुर बुलबुल बिल्ली की कपटी नीयत समझ गया। उसने डाली पर से ही कहा, “बिल्ली मौसी! तुम्हारी तारीफ़ के लिए धन्यवाद, लेकिन मेरी माँ कहती थी कि शिकारी की मीठी बातों में कभी नहीं फँसना चाहिए। अगर मैं नीचे आया तो तुम मुझे खा जाओगी।”
बिल्ली की चालाकी विफल हो गई और वह शर्मिंदा होकर चली गई। बुलबुल ने अपनी बुद्धि से अपनी जान बचा ली।