एक सुंदर नगर में एक दयालु दर्ज़ी की दुकान थी। उसी नगर से होकर रोज़ एक गजराज (हाथी) नदी में नहाने जाया करता था। दर्ज़ी रोज़ हाथी को देखकर उसे केले या सुंदर फल खाने को देता था। इस तरह दर्ज़ी और हाथी के बीच गहरी मित्रता हो गई।
एक दिन दर्ज़ी अपने काम में व्यस्त था और उसका मूड ख़राब था। हाथी ने रोज़ की तरह अपनी सूंड दुकान की खिड़की से अंदर बढ़ाई। दर्ज़ी ने गुस्से में आकर रोटी या फल देने के बजाय हाथी की सूंड में सुई चुभो दी।
हाथी को बहुत दुख हुआ, लेकिन उसने वहाँ कोई विरोध नहीं किया और शांति से नदी की ओर चला गया। नदी पहुँचकर हाथी ने पेट भरकर पानी पिया और अपनी सूंड में गंदा कीचड़ वाला पानी भर लिया।
वापस लौटते समय हाथी दर्ज़ी की दुकान पर पहुँचा और अपनी सूंड का सारा गंदा पानी दुकान में रखे सभी नए-नवेले कपड़ों पर छिड़क दिया। दर्ज़ी के सारे कीमती कपड़े ख़राब हो गए। दर्ज़ी को अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने हाथी से माफ़ी माँगी।