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सोने का बर्तन और न्यायप्रिय पंडित (The Golden Vessel and the Just Scholar)

🎭 મુખ્ય પાત્રો: देवदत्त (ईमानदार पंडित), धनपत (लालची पड़ोसी), न्यायाधीश, राजा

सोने का बर्तन और न्यायप्रिय पंडित (The Golden Vessel and the Just Scholar)
અક્ષરનું માપ:

एक छोटे से शांत गाँव में देवदत्त नाम का एक ग़रीब लेकिन अत्यंत सच्चा और ईमानदार पंडित रहता था। वह अपने छोटे से खेत में मेहनत करके जीवन बसर करता था। एक दिन अपने खेत में हल चलाते समय उसके हल से कोई चीज़ टकराई। खोदकर देखा तो मिट्टी के घड़े से एक चमकता हुआ सोने का बर्तन निकला।

देवदत्त के लालची पड़ोसी धनपत ने यह दृश्य देख लिया। वह दौड़कर आया और दावा करने लगा, “इस ज़मीन की सीमा मेरी है, इसलिए यह सोने का बर्तन मेरा है!” देवदत्त ने शांति से कहा, “हम राजा के दरबार में चलते हैं और न्याय माँगते हैं।”

दरबार में न्यायाधीश ने दोनों की बातें सुनीं और कहा, “जो व्यक्ति सोने के बर्तन का उपयोग प्रजा कल्याण और धार्मिक कार्यों में करेगा, उसे ही यह दिया जाएगा।” लालची धनपत चुप हो गया। देवदत्त ने कहा, “मैं इस सोने के बर्तन से गाँव में एक विद्यालय और कुआँ बनाऊँगा।”

न्यायाधीश ने देवदत्त की निःस्वार्थ भावना देखकर सोने का बर्तन उसे सौंप दिया और राजा ने उसे सम्मानित किया। लालची पड़ोसी शर्मिंदा हो गया।

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વાર્તાનો બોધ (Moral of the Story)

ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से किए गए संकल्प की हमेशा विजय होती है; लालच करने वाले को अंत में केवल शर्मिंदगी ही हाथ लगती है।