विजयनगर के एक उदार राजा थे, जो रोज़ सुबह दरबार में गरीबों को दान दिया करते थे। एक दिन एक गरीब वृद्ध आदमी दरबार में आया। उसने राजा से विनती की कि उसके बेटे के इलाज के लिए दस सोने के सिक्के चाहिए।
राजा के एक कपटी मंत्री ने सोचा कि यह बूढ़ा झूठ बोल रहा है। उसने राजा को भड़काया कि इसे सिक्के न दिए जाएँ। राजा ने परीक्षा लेने के लिए वृद्ध से कहा, “मैं तुम्हें दस हज़ार सोने के सिक्के दूँगा, लेकिन तुम्हें मुझे भगवान दिखाने होंगे।” वृद्ध ने दो दिन का समय माँगा।
तीसरे दिन वृद्ध दरबार में एक बर्तन लेकर आया जिसमें दूध था। उसने राजा से कहा, “महाराज, इस दूध में घी है, लेकिन वह दिखाई नहीं दे रहा है। जब हम दूध को मथकर मक्खन बनाते हैं, तभी घी प्रकट होता है। ठीक इसी तरह भगवान भी सृष्टि के कण-कण में बसे हुए हैं, लेकिन हमारी आंतरिक भक्ति और निस्वार्थ कर्म से ही वे दिखाई देते हैं।” राजा इस ज्ञान और दर्शन से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वृद्ध को दस हज़ार सोने के सिक्के दे दिए।