हमारे पवित्र देश भारत की महान संस्कृति में व्रतों, त्यौहारों, तप और भक्ति का अत्यंत पावन स्थान है। विशेष रूप से श्रावण और भाद्रपद महीने के पवित्र दिनों में कन्याओं तथा सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए कई मंगलकारी व्रतों का विधान है। इन सभी पावन व्रतों में ‘फूल कजली व्रत’ (Ful Kajli Vrat) का स्थान अत्यंत पवित्र, फलदायी और महिमामयी माना गया है। यह व्रत कन्याओं के उत्तम भविष्य, अखंड सौभाग्य, सुसंस्कार, पारिवारिक सुख-शांति तथा माता पार्वती और भगवान शिव की असीम अनुकंपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
प्राचीन काल की बात है। गुजरात क्षेत्र की एक अत्यंत समृद्ध और सुंदर नगरी में ‘चंदनसिंह’ नाम के एक प्रजाहितैषी और धार्मिक राजा राज्य करते थे। राजा चंदनसिंह के राज्य में सभी प्रजाजन बहुत ही सुखी, संपन्न और धर्मपरायण थे। राजा की एक बहुत ही सुशील, संस्कारी और धर्मनिष्ठ पुत्री थी, जिसका नाम ‘कविता’ था। राजकुमारी कविता बचपन से ही भगवान शिव और माता गौरी (पार्वती) की अनन्य भक्त थी। वह प्रतिदिन प्रातः काल उठकर शिव मंदिर जाती, शिवलिंग का जलाभिषेक करती और माता गौरी का पूजन करती थी।
जब कविता युवा हुई, तब श्रावण मास के पवित्र दिन आए। नगर की सभी कन्याओं ने मिलकर माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए ‘फूल कजली व्रत’ का अनुष्ठान करने का संकल्प लिया। इस व्रत के नियम अत्यंत पवित्र और निष्ठापूर्ण होते हैं। व्रत रखने वाली कन्याओं को प्रातः काल स्नान करके बागीचे से ताजे सुगंधित फूल चुनकर लाने होते हैं, पूरे दिन निर्जला या फलाहारी उपवास रखना होता है, माता पार्वती और शिवजी के सम्मुख दीपक जलाकर ताजे पुष्प अर्पित करने होते हैं तथा आँखों में काजल (कजली) लगाकर व्रत कथा का श्रवण करना होता है।
राजकुमारी कविता ने भी अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और मन की पवित्रता के साथ इस फूल कजली व्रत को प्रारंभ किया। वह प्रतिदिन सुबह बागीचे से ताजे चमेली, गुलाब, गेंदा और कमल के सुंदर पुष्प चुनकर लाती। वह सोने की थाल में चंदन, अक्षत, धूप और घी का दीपक सजाती। माता गौरी के चरणों में ताजे पुष्प अर्पित करके वह भावविभोर होकर प्रार्थना करती: “हे माँ जगदंबा! हे अन्नपूर्णा गौरी माँ! आप दयालु हैं। मेरे परिवार, मेरी प्रजा और पूरे संसार पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना।”
इसी नगर में एक बड़े धनी सेठ की घमंडी पुत्री भी रहती थी, जिसका नाम ‘चंपा’ था। चंपा केवल दिखावे और अहंकारवश यह व्रत कर रही थी। उसे अपने धन-दौलत, कीमती आभूषणों और सुंदर वस्त्रों का बहुत अभिमान था। वह व्रत के नियमों का पालन नहीं करती थी, मन में क्रोध रखती थी और बासी या मुरझाए हुए फूल चढ़ाकर जल्दी-जल्दी पूजा समाप्त कर देती थी। चंपा कविता की सच्ची भक्ति देखकर उसका मज़ाक उड़ाती और कहती, “इतनी मेहनत करने की क्या आवश्यकता है? देवी माँ तो धन-दौलत से ही प्रसन्न हो जाती हैं।”
लेकिन कविता ने चंपा की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपनी निश्छल भक्ति से व्रत जारी रखा। व्रत का अंतिम और मुख्य दिन आ पहुँचा। उस दिन कविता ने पूरे दिन जल भी ग्रहण नहीं किया और कठोर उपवास रखा। संध्या काल में कविता ने घी का दीपक जलाया, माता जी को पवित्र कजली और ताजे कमल के पुष्प चढ़ाए तथा श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।
कविता की ऐसी निश्छल भक्ति, कठोर निष्ठा और पवित्र हृदय देखकर कैलाश पर्वत पर विराजमान माता पार्वती और भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। माता गौरी तुरंत दिव्य और तेजोमय रूप में कविता के सामने प्रकट हो गईं!
माता पार्वती जी के दिव्य दर्शन पाकर कविता की आँखों से आनंद के आँसू छलक पड़े। उसने माता जी के चरणों में दंडवत प्रणाम किया। माता पार्वती ने मधुर और करुणामयी वाणी में कहा, “पुत्री कविता! तुम्हारे निर्मल हृदय की भक्ति, अहंकाररहित व्रत और इन ताजे शुद्ध पुष्पों के समर्पण से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें अखंड सौभाग्य, दीर्घायु और सर्व सुखों से पूर्ण जीवन का वरदान देती हूँ। तुम्हारे जीवन में कभी दुख या निराशा का अंधकार नहीं आएगा।”
माता जी ने अपने हाथों से कविता को प्रसाद दिया और आशीर्वाद प्रदान किया। दूसरी ओर, घमंडी चंपा की अश्रद्धा और बासी पुष्पों की पूजा के कारण उसका मन हमेशा अशांत रहा और अपार धन होने के बाद भी उसे सच्चा सुख नहीं मिला। चंपा को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ। वह कविता के पास आई और अपने अहंकार के लिए क्षमा माँगी। कविता ने उसे प्रेम से क्षमा किया और फूल कजली व्रत की सही विधि व महिमा समझाई।
तभी से पूरे नगर और क्षेत्र में ‘फूल कजली व्रत’ की महिमा अमर हो गई। कन्याएँ और स्त्रियाँ हर साल श्रावण मास में अत्यंत भक्ति और पवित्रता से इस व्रत को करने लगीं।
यह पावन कथा हमें यह अनमोल शिक्षा देती है कि ईश्वर कभी बाहरी दिखावे, अहंकार या धन-दौलत से प्रसन्न नहीं होते। भगवान तो केवल निर्मल मन, सच्ची श्रद्धा, निष्ठा और प्रेम से अर्पित किए गए दो ताजे पुष्पों से ही रीझ जाते हैं। जीवन में प्रत्येक व्रत और धार्मिक कार्य सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से करना चाहिए, जिससे जीवन में अखंड सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।