एक किसान सोमदत्त अपने खेत में काम कर रहा था। उसके खेत के बीचों-बीच एक बड़ा पत्थर था जहाँ एक बाँबी (साँप का बिल) बनी हुई थी। एक दिन सोमदत्त ने बाँबी से बाहर निकलते हुए एक बड़े कोबरा (नाग) को देखा। उसने सोचा कि यह खेत का रक्षक है और उसे इसे दूध पिलाना चाहिए।
सोमदत्त ने मिट्टी के एक कटोरे में दूध भरकर बाँबी के पास रख दिया और प्रणाम किया। अगले दिन सुबह जब वह वापस आया, तो उसे कटोरे में सोने का एक सिक्का पड़ा हुआ मिला। इसके बाद रोज़ सोमदत्त दूध रखता और नागराज साँप उसे सोने का एक सिक्का देता था। यह सिलसिला काफ़ी समय तक चला और किसान बहुत धनी बन गया।
एक दिन सोमदत्त को दूसरे गाँव जाना पड़ा और उसने अपने बेटे को साँप को दूध देने की ज़िम्मेदारी सौंपी। बेटा लालची था, उसने सोचा कि बाँबी के अंदर सोने के सिक्कों का बड़ा ख़ज़ाना भरा हुआ है। उसने साँप को मारकर ख़ज़ाना हासिल करने के लिए लकड़ी से वार किया। साँप ने गुस्से में आकर बेटे को डंस लिया, जिससे बेटे की मौत हो गई। जब सोमदत्त वापस आया और साँप के पास माफ़ी माँगने गया, तब साँप ने कहा, “सोमदत्त, तुम्हारे बेटे की मौत का दुख और मुझ पर पड़े लकड़ी के घाव के निशान अब हमें कभी साथ नहीं आने देंगे।”