एक सुंदर पहाड़ी के पीछे एक बेहद अनोखा और सुंदर जादुई पेड़ था। इस पेड़ की खासियत यह थी कि इसके पत्ते मोतियों की तरह चमकते थे और इस पर मीठे सेब और नाशपाती जैसे जादुई फल उगते थे। जो भी इन फलों को खाता, वह खुश हो जाता और उसके मन की उदासी दूर हो जाती। इस पेड़ का नाम “आनंदवृक्ष” था।
आनंदवृक्ष के पास एक खुशियों का बगीचा था, जहाँ जंगल के छोटे-बड़े सभी जानवर और पक्षी हर दिन खेलने आते थे। लेकिन एक दिन उस गाँव में सोमिल नाम का एक लालची आदमी आया। उसने सुनहरे चमकते फलों को देखा और सोचा, “अगर मैं इन सभी फलों को तोड़कर बाजार में बेच दूँ, तो मैं बहुत अमीर बन जाऊँगा!”
सोमिल रात में चुपके से बगीचे में गया और कुल्हाड़ी लेकर पेड़ के फल तोड़ने लगा। लेकिन जादुई पेड़ ने सोमिल के मन का लालच देख लिया। जैसे ही सोमिल ने एक फल तोड़ा, उसी क्षण फल काला पड़ गया और सूख गया! पूरे बगीचे के पत्ते मुरझा गए और उनकी चमक गायब हो गई।
सोमिल घबरा गया। पेड़ से एक धीमी और गंभीर आवाज आई, “हे मानव! मेरी शक्तियाँ स्वार्थ और लालच के लिए नहीं हैं। ये फल केवल जरूरतमंदों और भूखे जानवरों के लिए हैं। लालच करने से खुशियाँ गायब हो जाती हैं।”
सोमिल को अपने लालच और गलती पर पछतावा हुआ। उसने पेड़ के सामने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और वचन दिया कि वह कभी लालच नहीं करेगा और गरीब बच्चों तथा भूखे जानवरों को भोजन कराएगा। सोमिल के सच्चे पश्चाताप को देखकर आनंदवृक्ष फिर से हरा-भरा हो गया और चमकने लगा।
उस दिन से सोमिल ने अपने हाथों से भूखे बच्चों को मीठे फल बाँटना शुरू कर दिया। उसे समझ में आया कि फल बेचकर पैसे कमाने से कहीं अधिक आनंद दूसरों के चेहरे पर खुशी लाने में मिलता है, और वह खुशी दुनिया में सबसे अनमोल है।