एक छोटे से गाँव में रामलाल नाम का एक टोपी बेचने वाला फेरीवाला रहता था। वह लाल, हरी, पीली और नीली रंग-बिरंगी टोपियाँ बनाकर गाँव-गाँव जाकर बेचता था।
एक गर्म दोपहर रामलाल टोपियाँ बेचकर दूसरे गाँव जा रहा था। गर्मी बहुत ज़्यादा थी, इसलिए वह थक गया था। रास्ते में उसे एक बड़ा और घना बरगद का पेड़ मिला। उसने अपनी टोपियों की टोकरी पेड़ के नीचे रखी और ठंडी छाया में लेटकर सो गया। कुछ ही देर में उसे गहरी नींद आ गई।
उस बरगद के पेड़ पर बहुत सारे शरारती बंदर रहते थे। उन्होंने रामलाल को सोते हुए देखा और टोकरी में रखी रंग-बिरंगी टोपियाँ देखीं। वे धीरे-धीरे पेड़ से नीचे उतरे, टोकरी से एक-एक टोपी उठाई, अपने सिर पर पहन ली और फिर वापस पेड़ पर चढ़ गए।
कुछ समय बाद रामलाल की आँख खुली। उसने देखा कि उसकी टोकरी पूरी तरह खाली थी। वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। तभी उसकी नज़र पेड़ की डालियों पर बैठे बंदरों पर पड़ी। सभी बंदरों ने उसकी रंग-बिरंगी टोपियाँ अपने सिर पर पहन रखी थीं। यह देखकर रामलाल पहले तो परेशान हुआ, लेकिन उसने धैर्य नहीं खोया।
रामलाल जानता था कि बंदर नकल करने में माहिर होते हैं। उसने पहले गुस्से का अभिनय करते हुए अपना हाथ हवा में घुमाया। बंदरों ने भी उसकी नकल करते हुए अपने हाथ घुमाए। फिर रामलाल ने अपने सिर की टोपी उतारी और ज़मीन पर फेंक दी। बंदरों ने भी तुरंत उसकी नकल की और अपने-अपने सिर की सारी टोपियाँ ज़मीन पर फेंक दीं।
रामलाल ने तुरंत सभी टोपियाँ इकट्ठी कीं, उन्हें अपनी टोकरी में रखा और खुशी-खुशी अपने अगले सफर पर निकल पड़ा।