होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर धधकती हुई अग्नि की चिता पर बैठ गई। लेकिन प्रह्लाद पूरे समय भगवान का स्मरण करता रहा। भगवान की कृपा से एक चमत्कार हुआ। तेज़ हवा चली और होलिका की दिव्य ओढ़नी उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गई। होलिका अग्नि में जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आया।
इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है, जो असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। अगले दिन धुलेंडी (रंगों की होली) के अवसर पर लोग एक-दूसरे को लाल, पीले और गुलाबी रंग लगाकर प्रेम, भाईचारे और खुशियों का उत्सव मनाते हैं।