एक दोपहर एक भूखा सियार भोजन की तलाश में अंगूर के एक बाग़ में आ पहुँचा। बाग़ में सुंदर, पकी हुई और जामुनी रंग के अंगूरों के गुच्छे बेलों पर लटक रहे थे। अंगूरों को देखकर सियार के मुँह में पानी आ गया।
अंगूर काफ़ी ऊँचाई पर थे। सियार ने बेलों की तरफ़ देखकर ज़ोरदार छलाँग लगाई, लेकिन वह गुच्छों तक नहीं पहुँच सका। उसने फिर से, थोड़ी दूर से दौड़कर और भी बड़ी छलाँग लगाई, फिर भी वह असफ़ल रहा। सियार ने दोपहर की धूप में बार-बार प्रयास किए, लेकिन गुच्छे बहुत ऊँचे थे।
थककर पस्त (हाल-बेहाल) हुआ सियार आख़िरकार वापस लौट गया। उसने अपनी हार छिपाने और मन को बहलाने के लिए ज़ोर से कहा, “अंगूर बहुत खट्टे हैं, मुझे ऐसे खट्टे अंगूर बिल्कुल पसंद नहीं हैं।”