एक विशाल, हरे-भरे और अत्यंत सुंदर जंगल के बीचों-बीच एक गहरी, चौड़ी और कल-कल बहती नदी बहती थी। नदी के एक तरफ घना जंगल था जहाँ कई छोटे-बड़े जानवर मिल-जुलकर शांति से रहते थे। उन्हीं जानवरों में ‘संजीव’ नाम का एक छोटा, बर्फ जैसा सफेद और बहुत ही साहसी तथा बुद्धिमान खरगोश भी निवास करता था। संजीव अपने दोस्तों के प्रति बहुत दयालु था और हमेशा नई-नई बातें सीखने के लिए उत्सुक रहता था।
नदी के दूसरे तट पर एक अद्भुत और रसीले फलों का बगीचा था। वहाँ पके हुए पीले अमरूद, मीठे रसीले आम, लाल-लाल सेब और अंगूर के गुच्छे लटकते थे। सभी जानवर उन फलों को खाने की तीव्र इच्छा रखते थे, लेकिन नदी में ‘कालिया’ नाम का एक अत्यंत विशाल और क्रूर मगरमच्छ रहता था। जो भी जानवर नदी पार करके दूसरे किनारे जाने की कोशिश करता, कालिया उसे अपने नुकीले दांतों में दबाकर अपना भोजन बना लेता था। इसलिए डर के मारे कोई भी जानवर नदी के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था।
एक दिन संजीव खरगोश ने विचार किया कि केवल डर के मारे हाथ पर हाथ धरकर बैठने से कोई समस्या हल नहीं होती। उसने जंगल के सभी छोटे जानवरों जैसे गिलहरी, हिरन और खरगोशों को इकट्ठा किया और कहा, “मित्रों! यदि हम डर के साए में जीते रहेंगे, तो कभी भी उस पार के मीठे फलों का स्वाद नहीं ले पाएँगे। यदि हम साहस, एकता और बुद्धि का प्रयोग करें, तो इस कठिन कार्य को भी आसान बनाया जा सकता है।”
सभी जानवरों ने डरते हुए पूछा, “लेकिन संजीव! उस भयानक कालिया मगरमच्छ से हम कैसे बचेंगे? वह तो हमें एक ही सांस में निगल जाएगा!”
संजीव खरगोશ ने एक बहुत ही चतुर योजना बनाई। वह अकेला नदी के किनारे गया और एक सुरक्षित टीले पर खड़े होकर ज़ोर से चिल्लाया, “हे कालिया मगरमच्छ जी! हमारे जंगल के राजा शेरसिंह ने नदी के सभी मगरमच्छों की गिनती करने का आदेश दिया है! राजा साहब आप सभी मगरमच्छों के लिए एक विशाल और भव्य दावत का आयोजन कर रहे हैं। क्या आप बता सकते हैं कि इस नदी में आपके साथ कुल कितने मगरमच्छ रहते हैं?”
कालिया मगरमच्छ बहुत ही घमंडी और पेटू था। भव्य दावत की बात सुनते ही उसके मुँह में पानी आ गया। उसने कहा, “हम तो इस पूरी नदी में सौ से भी ज्यादा मगरमच्छ हैं!”
संजीव ने मुस्कुराकर कहा, “यदि आप सभी दावत का आनंद लेना चाहते हैं, तो इस किनारे से उस किनारे तक अपने सभी साथियों को एक सीधी लाइन में खड़ा कर दीजिए, ताकि मैं आसानी से आप सबकी गिनती करके राजा साहब को रिपोर्ट दे सकूँ।”
दावत के लालच में आकर कालिया मगरमच्छ ने अपने सभी मगरमच्छ साथियों को बुलाया और नदी के इस पार से उस पार तक एक मजबूत पुल की तरह सीधी लाइन बनवा दी।
संजीव खरगोश ने एक पल भी गँवाए बिना निडर होकर पहली मगरमच्छ की पीठ पर छलांग लगाई और गिनना शुरू किया, “एक… दो… तीन… चार…” संजीव अत्यंत फुर्ती से एक के बाद दूसरे मगरमच्छ की पीठ पर कूदता हुआ नदी के दूसरे किनारे पर सुरक्षित पहुँच गया!
दूसरे किनारे पर पहुँचकर संजीव ने ज़ोर से हँसते हुए कहा, “कालिया जी! कोई दावत नहीं थी, यह तो मेरी बुद्धि और साहस की परीक्षा थी!”
कालिया मगरमच्छ हाथ मलता रह गया। संजीव खरगोश के इस अदम्य साहस से नदी पार करने का रास्ता खुल गया और उसने अपने सभी दोस्तों के लिए ढेर सारे मीठे फल लाकर बांटे।
यह कहानी हमें सिखाती है कि आकार में छोटे होने पर भी यदि मन में अटूट साहस, धैर्य और तीक्ष्ण बुद्धि हो, तो बड़ी से बड़ी बाधा और शक्तिशाली शत्रु को भी आसानी से पराजित किया जा सकता है।