एक बगीचे में एक अत्यंत सुंदर मोर रहता था। उसके पंख हरे, नीले और सुनहरे रंगों से चमकते थे। जब भी वह अपने सुंदर पंख फैलाकर नाचता, पूरा बगीचा उसकी सुंदरता से जगमगा उठता। लेकिन मोर को अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड था।
वह बगीचे के दूसरे सभी पक्षियों को बदसूरत कहता और उनका मज़ाक उड़ाता था। एक दिन बगीचे के तालाब के किनारे एक सारस (क्रेन) आया। सारस के पंख सफेद और साधारण थे।
मोर ने सारस को देखा और हँसते हुए कहा, “अरे सारस! तुम्हारे पंख कितने फीके और साधारण हैं। तुम्हारे शरीर में तो कोई रंग ही नहीं है। ज़रा मेरे पंखों को देखो, मानो किसी राजा के अनमोल वस्त्र हों!”
सारस ने मोर की बात शांतिपूर्वक सुनी। फिर मुस्कुराया और अपने लंबे पंख फैलाकर आकाश की ओर उड़ गया। वह बहुत ऊँचाई तक उड़ता हुआ बादलों के बीच पहुँच गया।
आकाश से सारस ने नीचे खड़े मोर से कहा, “मोर भाई! इसमें कोई संदेह नहीं कि आपके पंख बहुत सुंदर और रंग-बिरंगे हैं। लेकिन इतने सुंदर पंख होने के बावजूद भी आप केवल ज़मीन पर ही चल सकते हैं, ऊँची उड़ान नहीं भर सकते। जबकि मेरे ये साधारण पंख मुझे खुले आकाश में स्वतंत्र होकर उड़ने की शक्ति देते हैं।”
मोर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे बहुत शर्म आई। उसने समझ लिया कि बाहरी सुंदरता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण किसी व्यक्ति या वस्तु के गुण और उसकी उपयोगिता होती है। उस दिन के बाद से मोर ने घमंड करना छोड़ दिया।