एक अत्यंत सुंदर, पहाड़ी और हरे-भरे गाँव में ‘यश’ नाम का एक छोटा और बहुत ही दयालु बालक रहता था। यश के पिता गाँव में एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे। यश स्वभाव से बहुत ही नम्र, मीठा बोलने वाला और सभी पशु-पक्षियों तथा जरूरतमंदों के प्रति गहरी दया भावना रखने वाला बालक था। जब भी वह रास्ते में किसी भूखे कुत्ते, घायल पक्षी या असहाय वृद्ध को देखता, तो अपने हिस्से की रोटी या खाना उन्हें दे देता था।
गाँव के पीछे एक घना और बहुत प्राचीन जंगल फैला हुआ था। गाँव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि उस जंगल के बीचों-बीच एक गुप्त स्थान पर एक बहुत ही चमत्कारी और जादुई बरगद का पेड़ है। उस जादुई पेड़ के बारे में यह लोककथा प्रसिद्ध थी कि वह पेड़ केवल उसी व्यक्ति को सोने जैसे चमकदार और दिव्य फल प्रदान करता है, जिसके मन में लेशमात्र भी लालच न हो और जिसका हृदय सच्ची दयालुता से भरा हो।
एक दिन दोपहर के समय यश लकड़ी और सूखे पत्ते एकत्र करने के लिए जंगल में गया। घूमते-घूमते यश जंगल के एक ऐसे हिस्से में पहुँच गया जहाँ वह पहले कभी नहीं गया था। वहाँ की हवा में एक अनूठी सुगंध और शांत उजाला था। ठीक बीच में उसे एक अद्भुत और विशालकाय बरगद का वृक्ष दिखाई दिया, जिसकी शाखाओं से सुनहरी किरणें फूट रही थीं! यह वही जादुई वृक्ष था।
यश आश्चर्यचकित होकर उस वृक्ष के निकट गया। तभी उसने देखा कि वृक्ष की एक डाल पर एक नन्ही गौरैया पंख में चोट लगने के कारण तड़प रही थी और प्यास से बेहाल थी। यश ने बिना एक पल गँवाए अपनी पानी की बोतल से छोटी सी कटोरी में जल भरा और प्यार से उस नन्ही चिड़िया को पिलाया। इसके बाद उसने अपने रूमाल से उसके पंख पर सावधानी से पट्टी बाँधी।
ठीक उसी समय एक बूढ़े, कमज़ोर और अत्यंत भूखे दिखने वाले साधु बाबा उस वृक्ष के नीचे आकर बैठे। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, “बेटा! मुझे बहुत तेज़ भूख लगी है। क्या आपके पास खाने के लिए कुछ है?”
यश के पास केवल दो रोटियाँ और थोड़ा सा गुड़ था, जो उसकी माँ ने उसे दोपहर के भोजन के लिए दिया था। यश ने पल भर की भी देरी किए बिना अपनी रोटियाँ और गुड़ साधु बाबा के चरणों में अर्पित कर दिए और कहा, “बाबा! आप आराम से यह भोजन ग्रहण कीजिए। मुझे अभी भूख नहीं है।”
जैसे ही साधु बाबा ने भोजन स्पर्श किया, वैसे ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ! वे बूढ़े साधु साक्षात दिव्य तेजोमय वनदेवता के रूप में प्रकट हो गए! जादुई वृक्ष की सभी डालियों से सोने की तरह चमकते हुए रसीले दिव्य फलों की वर्षा होने लगी।
वनदेवता ने प्रसन्न होकर कहा, “बेटा यश! तुम्हारी परीक्षा पूर्ण हुई। कई धनवान और लालची लोग इस सोने के वृक्ष को ढूँढने आए थे, लेकिन किसी के मन में सच्ची दया नहीं थी। तुमने अपनी भूख और सुख को भूलकर एक बेजुबान चिड़िया और एक भूखे वृद्ध की सेवा की। तुम्हारा यह दयालु हृदय ही इस संसार का सबसे बड़ा खजाना है!”
वनदेवता ने यश को जादुई वृक्ष के दिव्य फल प्रदान किए, जिससे उसके परिवार की गरीबी हमेशा के लिए मिट गई। यश ने उन फलों और धन का उपयोग गाँव के गरीबों की भलाई के लिए किया।