एक तालाब के किनारे एक बूढ़ा बगुला रहता था। उम्र बढ़ जाने के कारण अब उससे मछलियों का शिकार नहीं होता था। भूख से बचने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब के किनारे खड़ा होकर झूठे आँसू बहाने लगा।
तालाब में रहने वाले एक केकड़े ने पूछा, “बगुला जी, आप क्यों रो रहे हैं?” बगुले ने दयनीय आवाज़ में कहा, “मैंने सुना है कि जल्द ही बड़ा सूखा पड़ने वाला है और यह तालाब सूख जाएगा। मुझे आप सभी के लिए बहुत दुख हो रहा है।” यह सुनकर मछलियाँ और केकड़ा घबरा गए और मदद माँगने लगे।
बगुले ने कहा, “मैं आप सभी को रोज़ एक-एक करके पास के बड़े सरोवर में पहुँचा सकता हूँ।” सभी मछलियाँ उसकी बात में आ गईं। बगुला रोज़ एक मछली को मुँह में उठाकर दूर पहाड़ी पर ले जाता और वहाँ उसे खा जाता। कुछ दिनों बाद केकड़े ने भी सरोवर जाने की इच्छा जताई।
बगुला केकड़े को अपनी पीठ पर बैठाकर उड़ चला। पहाड़ी पर पहुँचते ही केकड़े ने मछलियों की हड्डियों का ढेर देखा और बगुले का पाप समझ गया। केकड़े ने ज़रा भी घबराए बिना अपने मज़बूत नुकीले पंजों से बगुले की गर्दन पकड़ ली और उसे ज़ोर से दबा दिया। बगुला नीचे गिर पड़ा और इस तरह केकड़े ने अपनी और बाकी जीवों की रक्षा की।