एक घने बरगद के पेड़ पर कौए और कौवी का घोंसला था। वे बहुत प्रेम से रहते थे। लेकिन उसी पेड़ के खोखल (कोटर) में एक काला दुष्ट साँप भी रहता था। जब भी कौवी अंडे देती, तब साँप खोखल से बाहर आता और अंडे खा जाता।
कौआ और कौवी इस बात से बहुत दुखी थे। वे अपने मित्र चतुर सियार के पास सलाह लेने गए। सियार ने कहा, “शक्ति से नहीं बल्कि बुद्धि से काम लो। राजकुमारी रोज़ सुबह नदी में नहाने आती है, वहीं से कोई तरकीब निकालो।”
अगले दिन सुबह राजकुमारी अपने कीमती सोने के हार और आभूषण किनारे रखकर नदी में नहा रही थी। कौआ उड़कर आया और सोने का हार अपनी चोंच में उठाकर उड़ चला। राजकुमारी के सैनिक कौए के पीछे दौड़े।
कौए ने बरगद के पेड़ के पास आकर वह हार साँप के खोखल के अंदर डाल दिया। सैनिक वहाँ पहुँचे और हार निकालने के लिए खोखल में भाला डाला। गुस्से में भरा साँप बाहर आया और सैनिकों ने उस साँप को मार डाला। कौआ और कौवी हमेशा के लिए आज़ाद और सुखी हो गए।