एक रमणीय मैदान में चीकू नाम की एक मेहनती चींटी अपने दोस्तों के साथ रहती थी। चीकू पूरा दिन भीषण गर्मी में भी अनाज के दाने इकट्ठे करके अपने बिल में जमा करती थी। उसकी बगल में रहने वाला टीकू नाम का टिड्डा बहुत ही आलसी था। वह दिनभर गाने गाता और मस्ती करता रहता था।
टीकू टिड्डा अक्सर चींटी का मज़ाक़ उड़ाता और कहता, “अरे चीकू! इतनी बढ़िया धूप का मज़ा लो, अभी से सर्दियों की चिंता क्यों कर रही हो?” चींटी ने नम्रतापूर्वक कहा कि अगर हम आज मेहनत नहीं करेंगे, तो सर्दियों में खाने के लिए कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन आलसी टिड्डा उसकी बात हँसकर टाल देता था।
जब सर्दी का मौसम आया, तो पूरा मैदान बर्फ़ से ढक गया। चारों तरफ़ खाना मिलना असंभव हो गया। भूख और ठंड से व्याकुल होकर टीकू टिड्डा मदद के लिए चींटी के पास गया। चीकू चींटी के पास पर्याप्त भोजन था, फिर भी उसने टिड्डे को मेहनत का मूल्य समझाया और उसे थोड़ा भोजन दिया। टिड्डे को अपनी भूल का एहसास हो गया और उसने आलस्य छोड़कर मेहनत करने का संकल्प लिया।