एक तालाब में दो सुंदर मछलियाँ रहती थीं – एक का नाम सहस्रबुद्धि (हज़ार बुद्धि वाली) और दूसरी का नाम शतबुद्धि (सौ बुद्धि वाली) था। उसी तालाब में एक समझदार मेंढक भी रहता था जिसका नाम एकबुद्धि (एक बुद्धि वाला) था।
दोनों मछलियाँ अपनी बुद्धि और सुंदरता पर बहुत घमंड करती थीं। वे हमेशा मेंढक का मज़ाक़ उड़ाया करती थीं। एक शाम नदी (तालाब) के किनारे मछुआरे आए और बोले, “कल सुबह हम इस तालाब में जाल डालेंगे और सभी मछलियों को पकड़ लेंगे।”
मछुआरों की बात सुनकर मेंढक ने मछलियों से कहा, “चलो, हम यह तालाब छोड़कर किसी दूसरे सुरक्षित तालाब में चले जाते हैं।” लेकिन घमंडी मछलियाँ हँस पड़ीं और बोलीं, “हमें बचने की हज़ार तरकीबें आती हैं, हम डरकर भागेंगे नहीं।”
लेकिन समझदार मेंढक रात में ही तालाब छोड़कर पास के एक कुएँ में चला गया। अगले दिन सुबह मछुआरे आए और उन्होंने जाल फेंका। दोनों घमंडी मछलियाँ कितनी भी तरकीबें लगाने के बावजूद जाल में फँस गईं और पकड़ी गईं। मेंढक ने कुएँ में से सुरक्षित रहकर यह सब देखा।