प्राचीन समय में राजा शिबि अपनी दया, परोपकार और न्यायप्रियता के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। एक दिन राजा शिबि अपने दरबार में बैठे थे, तभी एक छोटा सा कबूतर घबराया और थरथराता हुआ उनकी गोद में आकर गिर पड़ा। उसके पीछे एक बड़ा बाज पक्षी भी झपटते हुए आया।
बाज ने कहा, “हे राजा! यह कबूतर मेरा भोजन है, इसलिए तुम इसे मुझे सौंप दो।” राजा शिबि ने विनम्रतापूर्वक कहा, “यह कबूतर मेरी शरण में आया है, इसलिए मैं किसी भी क़ीमत पर इसकी रक्षा करूँगा। इसके बदले में मैं तुम्हें कोई अन्य भोजन दे सकता हूँ।”
बाज ने ज़िद पकड़ ली, “अगर तुम्हें कबूतर को बचाना है, तो मुझे इस कबूतर के वज़न के बराबर अपने शरीर का मांस दो!” राजा तुरंत सहमत हो गए। उन्होंने तराज़ू मँगवाया। एक पलड़े में कबूतर को रखा और दूसरे पलड़े में अपने शरीर का मांस काटकर रखने लगे।
लेकिन कबूतर का वज़न बढ़ता ही गया। अंत में राजा खुद ही तराज़ू में बैठ गए। यह देखकर देवता प्रकट हुए, जिन्होंने बाज और कबूतर का रूप धारण किया था। वे राजा शिबि की परीक्षा ले रहे थे। देवताओं ने राजा को आशीर्वाद दिया और उनके घाव ठीक कर दिए।