एक सुंदर रसोईघर में दूध से भरा एक बड़ा मिट्टी का बर्तन (मटका) टेबल पर रखा हुआ था। खेलते-खेलते दो मेंढक अचानक उस बर्तन के अंदर गिर गए। बर्तन काफ़ी गहरा था और उसके किनारे बहुत चिकने थे, जिससे बाहर निकलना असंभव सा लग रहा था।
पहला मेंढक बहुत जल्दी निराश हो गया। उसने सोचा, “अब कोई आशा नहीं है, हम कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।” उसने अपने हाथ-पैर चलाने बंद कर दिए और वह दूध में डूब गया।
दूसरा मेंढक हिम्मत नहीं हारा। उसने मन में ठान लिया कि जब तक साँस है, तब तक वह संघर्ष करेगा। उसने लगातार अपने पैर चलाना जारी रखा। उसकी लगातार हलचल से दूध मथने लगा और धीरे-धीरे दूध के ऊपर मक्खन की एक मोटी परत जम गई।
मेंढक उस मक्खन की परत पर चढ़ गया और ज़ोर से छलाँग लगाकर बर्तन से बाहर निकल आया। उस दिन से वह समझ गया कि मुसीबत में कभी भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।