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जन्माष्टमी का पावन पर्व और बालकृष्ण की लीला (Story of Janmashtami and Little Krishna)

🎭 મુખ્ય પાત્રો: बालकृष्ण, माता यशोदा, वासुदेव

जन्माष्टमी का पावन पर्व और बालकृष्ण की लीला (Story of Janmashtami and Little Krishna)
અક્ષરનું માપ:

भाद्रपद (भादों) मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की काली रात समीप आ रही थी। गगन में भीषण बिजली कड़क रही थी और मूसलाधार वर्षा हो रही थी। यह पावन रात्रि संपूर्ण भारत में अत्यंत उल्लास के साथ मनाया जाने वाला पर्व ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ है।

प्राचीन मथुरा नगरी में ‘कंस’ नाम का एक अत्यंत अत्याचारी और पापी राजा राज करता था। कंस के पापों से पृथ्वी और मथुरा की प्रजा तड़प रही थी। एक आकाशवाणी हुई थी कि कंस की बहन देवकी की आठवीं संतान पापी कंस का वध करेगी। इस डर से कंस ने अपनी बहन देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया था।

अष्टमी की मध्यरात्रि को कारागार के सभी ताले अपने आप टूट गए और प्रहरी गहरी नींद में सो गए। उसी दिव्य क्षण भगवान श्रीहरि विष्णु ने बालकृष्ण के रूप में अवतार लिया! वासुदेव जी ने बालकृष्ण की रक्षा के लिए उन्हें सूप में रखा और उफनती यमुना नदी को पार करके गोकुल में नंदबाबा और माता यशोदा के घर पहुँचाया।

गोकुल में बालकृष्ण के आगमन से पूरा गोकुल आनंद और बधाई गीतों से गूँज उठा। यशोदा मैया ने लल्ला को गले से लगा लिया।

बालकृष्ण बचपन से ही अत्यंत नटखट और मनमोहक थे। वे गोकुल की गोपियों के मटकियों से ताजा माखन चुराकर खाते थे, इसलिए सभी उन्हें प्रेम से ‘माखनचोर’ कहते थे। बालकृष्ण ने अपनी छोटी सी आयु में ही पूतना, तृणावर्त जैसे भयानक राक्षसों का संहार किया और कालीनाग के विष से गोकुल को बचाया। जब देवराज इंद्र का अहंकार बढ़ गया, तो बालकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर विशाल ‘गोवर्धन पर्वत’ उठाकर पूरे गोकुल की रक्षा की थी!

आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने पापी कंस का वध करके अधर्म का नाश किया और धर्म की स्थापना की।

जन्माष्टमी का यह पावन पर्व हमें सिखाती है कि चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न छा जाए, सत्य और धर्म की विजय निश्चित है।

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વાર્તાનો બોધ (Moral of the Story)

अधर्म पर धर्म की और असत्य पर सत्य की हमेशा विजय होती है।