एक हरे-भरे जंगल के रास्ते पर एक बड़ा, चिकना और फिसलन भरा पत्थर पड़ा हुआ था। यह पत्थर जंगल के छोटे-छोटे कीट-पतंगों के लिए एक विशाल पर्वत जैसा था। उसी जंगल में ‘मिनी’ नाम की एक बेहद छोटी लेकिन अदम्य साहसी चींटी रहती थी।
एक दोपहर मिनी चींटी को ज़मीन पर चीनी का एक बड़ा और भारी टुकड़ा मिला। मिनी चींटी ने उस चीनी के टुकड़े को अपने मुँह में दबाया और अपने बिल की ओर जाने के लिए उस चिकने पत्थर पर चढ़ना शुरू किया।
लेकिन पत्थर बहुत फिसलन भरा था। मिनी चींटी थोड़ी ऊपर चढ़ी कि फिसलकर नीचे गिर गई! चीनी का टुकड़ा भी दूर जा गिरा।
पास के पेड़ के नीचे बैठा ‘बंटी’ नाम का खरगोश यह देखकर हँसने लगा, “अरे मिनी चींटी! तुम इतनी छोटी हो और यह पत्थर तुम्हारे लिए पहाड़ जैसा है। तुम इस पर कभी नहीं चढ़ पाओगी। प्रयास करना छोड़ दो!”
मिनी चींटी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने बंटी खरगोश से कहा, “बंटी भाई! हार मान लेना ही असली असफलता है। यदि मैं प्रयास करती रहूँगी, तो सफलता ज़रूर मिलेगी।”
मिनी चींटी ने दूसरी बार चीनी का टुकड़ा उठाया और चढ़ना शुरू किया। दूसरी बार भी वह फिसलकर गिर गई। तीसरी, चौथी और पाँचवीं बार भी मिनी चींटी गिरती रही!
लेकिन मिनी चींटी की आँखों में निराशा नहीं थी। उसने हर गिरावट के बाद दुगुने उत्साह से चढ़ना शुरू किया। सातवीं बार उसने अपने पैरों की पकड़ पत्थर की छोटी दरारों में मजबूत की। धीरे-धीरे, एक-एक इंच आगे बढ़ते हुए आखिरकार मिनी चींटी चीनी के टुकड़े के साथ पत्थर की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच गई!
यह देखकर जंगल के सभी जानवर दंग रह गए! सभी ने मिनी चींटी के निरंतर प्रयास की तालियाँ बजाकर तारीफ की।
यह कहानी हमें सिखाती है कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’। निरंतर प्रयास से बड़े से बड़ा लक्ष्य हासिल हो जाता है।