जनवरी का महीना आते ही पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। इस आनंदमय पर्व को उत्तरायण या मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है और हवा की दिशा भी बदल जाती है।
यह कहानी है एक छोटे से लड़के कानजी की। कानजी को पतंग उड़ाने का बहुत शौक था। वह लाल, पीली और नीली पतंगें लेकर सुबह-सुबह ही छत पर पहुँच जाता था। वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर पतंग उड़ाता और जब किसी की पतंग काट देता, तो खुशी से “वो काटा… लपेट…!” चिल्लाते हुए नाचने लगता।
उत्तरायण के दिन घर में मीठे तिल के लड्डू, चिक्की और स्वादिष्ट उंधियू-जलेबी बनाई जाती है। कानजी की दादी उसे समझाती थीं कि यह त्योहार केवल पतंग उड़ाने का नहीं, बल्कि दान करने और पक्षियों की रक्षा करने का भी है।
दादी ने कानजी से कहा कि चाइनीज़ मांझे (काँच वाली डोर) से मासूम पक्षी घायल हो जाते हैं, इसलिए हमेशा साधारण और सुरक्षित डोर का ही उपयोग करना चाहिए। कानजी ने दादी की बात मान ली और यह निश्चय किया कि वह ऐसे तरीके से पतंग उड़ाएगा जिससे किसी भी पक्षी को नुकसान न पहुँचे। शाम को छत पर दीपकों और रंग-बिरंगी कंदीलों की रोशनी के बीच सभी ने मिलकर खुशी-खुशी त्योहार मनाया।