एक सुंदर जंगल में सत्यव्रत नाम के एक साधु महाराज अपना आश्रम बनाकर रहते थे। वे कभी असत्य नहीं बोलते थे और हमेशा भगवान की भक्ति में लीन रहते थे। आसपास के गाँव के लोग उनकी सज्जनता और सत्यवादिता की प्रशंसा करते थे।
एक दिन उसी राज्य का एक घमंडी राजकुमार अपने सैनिकों के साथ शिकार करने निकला। जंगल में दौड़ते-दौड़ते राजकुमार रास्ता भटक गया और वह साधु के आश्रम के पास आ पहुँचा। राजकुमार ने अहंकार से कहा, “हे साधु! तू मुझे जंगल से बाहर निकलने का सही रास्ता बता!”
साधु महाराज ने शांति से मुस्कुराते हुए कहा, “राजकुमार! संपत्ति और सत्ता का अहंकार इंसान को सही रास्ता देखने नहीं देता। तुम्हारा आत्मा जब नम्र बनेगा, तभी तुम्हें सही मार्ग मिलेगा।” साधु की बात सुनकर राजकुमार पहले तो क्रोधित हुआ, लेकिन साधु महाराज की दिव्य वाणी ने उसके हृदय को छू लिया।
राजकुमार ने अपना अहंकार त्यागकर साधु महाराज के चरणों में प्रणाम किया। साधु महाराज ने उसे प्रेम से सरोवर और नगर की ओर जाने वाला सही रास्ता दिखाया। उस दिन से राजकुमार भी सत्य और नम्रता के मार्ग पर चलने लगा।