रमा एकादशी व्रत कथा: पद्म पुराण की अमर पौराणिक कथा, राजकुमारी चंद्रभागा का तपोबल, शोभन का पुनर्जीवन और अखंड ऐश्वर्य का रहस्य
मुख्य पात्र: राजा मुचुकुंद, राजकुमारी चंद्रभागा, राजकुमार शोभन, ब्राह्मण सोमशर्मा, महर्षि वामदेव, भगवान विष्णु, माता रमा (लक्ष्मी)
सनातन धर्म, पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, वर्ष भर में पड़ने वाली समस्त २४ एकादशियों में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का स्थान अत्यंत विलक्षण, पापनाशक और परम फलदायी माना गया है। इस पावन तिथि को रमा एकादशी (Rama Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीहरि विष्णु की आल्हादिनी शक्ति भगवती महालक्ष्मी का एक परम कल्याणकारी नाम ‘रमा’ (Rama) है। अतः इस पावन दिवस पर भगवान लक्ष्मीनारायण की संयुक्त पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि जो भी साधक इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है, उसके करोड़ों जन्मों के संचित पाप, ब्रह्महत्या जैसे महादोष भी तत्काल भस्म हो जाते हैं, घर में अक्षय धन-धान्य का वास होता है और अंत में वह परम पद वैकुंठ को प्राप्त करता है। इस पावन एकादशी से जुड़ी राजा मुचुकुंद, राजकुमारी चंद्रभागा और राजकुमार शोभन की अत्यंत भावपूर्ण, प्रेरक और चमत्कारी पौराणिक कथा पद्म पुराण में विस्तार से वर्णित है।
१. धर्मात्मा राजा मुचुकुंद और राज्य में एकादशी का कठोर नियम
प्राचीन काल में इक्ष्वाकु वंश में मंधाता के पुत्र परम प्रतापी, चक्रवर्ती और विष्णुभक्त राजा मुचुकुंद राज्य करते थे। उनकी मित्रता देवराज इंद्र, वरुण, यमराज और महर्षि वशिष्ठ जैसे देवताओं और ऋषियों के साथ थी। राजा मुचुकुंद एक महान योद्धा होने के साथ-साथ अत्यंत निष्ठावान वैष्णव थे। उनके राज्य में न्याय, शांति, धर्म और सत्य का साम्राज्य था।
राजा मुचुकुंद का अपने राज्य में एक अत्यंत कठोर और अटल धर्म-नियम था। उनके राज्य में जब भी एकादशी की पावन तिथि आती, तो नगर के प्रत्येक नागरिक — राजा से लेकर रंक, बालक से लेकर वृद्ध तक को अन्न का सर्वथा त्याग कर उपवास रखना पड़ता था। इतना ही नहीं, राजा के आदेशानुसार राज्य के हाथियों, घोड़ों, गौमाताओं, बैलों और पालतू पशुओं को भी एकादशी के दिन घास या दाना नहीं दिया जाता था; उन्हें केवल जल पर रखा जाता था। संपूर्ण राज्य में कोई भी जीव एकादशी को अन्न का स्पर्श नहीं कर सकता था।
२. राजकुमारी चंद्रभागा और राजकुमार शोभन का पावन विवाह
राजा मुचुकुंद के आंगन में परम पवित्र नदी ‘चंद्रभागा’ के नाम पर एक अत्यंत सुंदरी, विदुषी और सुलक्षणा कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम चंद्रभागा (Chandrabhaga) रखा गया। पिता के संस्कारों के कारण चंद्रभागा बाल्यावस्था से ही भगवान श्रीहरि विष्णु की अनन्य भक्त थी और नियमपूर्वक समस्त एकादशियों का निर्जला व्रत करती थी।
जब राजकुमारी चंद्रभागा विवाह योग्य हुई, तो उसका विवाह राजा चंद्रसेन के परम सुंदर और तेजस्वी राजकुमार शोभन (Shobhana) के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। राजकुमार शोभन सर्वगुण संपन्न था, किंतु शारीरिक दृष्टि से वह अत्यंत दुर्बल, कोमल और क्षुधा (भूख) सहन करने में सर्वथा असमर्थ था। वह मंदाग्नि रोग से पीड़ित था और तनिक भी भूख लगने पर मूर्छित हो जाता था।
३. ससुराल में शोभन का आगमन और रमा एकादशी का धर्मसंकट
एक बार कार्तिक मास में राजकुमार शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ अपने ससुराल राजा मुचुकुंद के नगर में पधारे। दैवयोग से ठीक उसी समय कार्तिक कृष्ण एकादशी यानी ‘रमा एकादशी’ का पावन दिन आ पहुंचा! संपूर्ण नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि: “कल रमा एकादशी है, राज्य का कोई भी मनुष्य अथवा पशु अन्न ग्रहण नहीं करेगा; सभी को उपवास रखना होगा।”
यह उद्घोषणा सुनते ही राजकुमार शोभन के होश उड़ गए। उसने भयभीत होकर अपनी पत्नी चंद्रभागा से एकांत में कहा: “प्रिये! तुम तो भली-भांति जानती हो कि मुझसे थोड़ी देर भी भूख सहन नहीं होती। यदि मैं अन्न-जल त्याग दूंगा, तो निश्चित ही मेरे प्राण निकल जाएंगे। मुझे बताओ कि इस संकट से बचने का क्या कोई उपाय है?”
चंद्रभागा ने अत्यंत कातर स्वर में कहा: “हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य का विधान अत्यंत कठोर है। यहां एकादशी के दिन पशु भी अन्न नहीं छूते, फिर मनुष्य की तो बात ही क्या! यदि आप भोजन मांगेंगे, तो मेरे पिता और आपका घोर उपहास होगा। और यदि आप भयभीत होकर यहां से भागेंगे, तो आपका क्षत्रिय धर्म कलंकित होगा। अब तो केवल भगवान कमलनयन ही आपके रक्षक हैं। आप धैर्यपूर्वक भगवान का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लीजिए।”
४. शोभन का अटल संकल्प और मध्यरात्रि में देहत्याग
राजकुमार शोभन ने विचार किया कि कायरों की भांति भागने से श्रेष्ठ है कि धर्म की रक्षा करते हुए प्राण त्याग दिए जाएं। उसने पत्नी से कहा: “प्रिये! जो प्रारब्ध में लिखा है, वही होगा। मैं भी तुम्हारे साथ रमा एकादशी का निर्जला व्रत करूंगा और अपना जीवन भगवान श्रीहरि के चरणों में समर्पित करूंगा।”
शोभन ने व्रत आरंभ किया। प्रातःकाल से दोपहर तक तो उसने जैसे-तैसे अपनी भूख पर नियंत्रण रखा। किंतु दोपहर ढलते ही उसके शरीर में भीषण दाह होने लगी, कंठ सूख गया और हाथ-पैर शिथिल हो गए। सूर्यास्त होते-होते वह भूमि पर गिर पड़ा। रात्रि में जब समस्त नगरवासी भगवान के मंदिर में जागरण, कीर्तन और स्तुति कर रहे थे, तब शोभन भूख-प्यास की असह्य ज्वाला में तड़प रहा था। अंततः मध्यरात्रि में अत्यधिक दुर्बलता और क्षुधा के आघात से शोभन के प्राण पखेरू उड़ गए!
राजमहल में हाहाकार मच गया। चंद्रभागा पर मानो वज्रपात हो गया। राजा मुचुकुंद ने शास्त्रोक्त विधि से दामाद का अंतिम संस्कार कराया। किंतु चंद्रभागा सती नहीं हुई; उसने अपने पिता के उपदेश पर विचार किया कि मैं इस नश्वर देह को जलाने के बजाय अपने पिता के घर रहकर भगवान विष्णु की अखंड तपस्या करूंगी और अपने पुण्यों से अपने पति का उद्धार करूंगी। वह अपने पिता के महल में रहकर निरंतर एकादशी के कठोर व्रत करने लगी।
५. रमा एकादशी का अलौकिक फल: मंदराचल पर दिव्य देवनगरी की प्राप्ति
सनातन शास्त्रों की घोषणा है कि एकादशी के पावन दिन जो भी प्राणी देहत्याग करता है, वह कभी यमलोक की यातना नहीं भोगता। यद्यपि शोभन ने यह व्रत विवशता और भय में किया था, फिर भी उसने कार्तिक कृष्ण रमा एकादशी के दिन पूर्ण निराहार रहकर प्राण त्यागे थे! इस एक ही एकादशी के अमोघ प्रभाव से शोभन को कोई निकृष्ट योनि नहीं मिली, अपितु उसे दिव्य देह प्राप्त हुआ।
उसे मंदराचल पर्वत (Mount Mandarachal) के अत्यंत सुरम्य शिखर पर एक अलौकिक, स्वर्णमयी ‘देवपुर’ नामक दिव्य नगरी का चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त हुआ! वहां मणियों से जड़े प्रासाद, कल्पवृक्ष, कामधेनु, सुवर्ण सरोवर और हजारों गंधर्व-अप्सराएं उसकी सेवा में उपस्थित रहते थे। शोभन रत्नजड़ित छत्र के नीचे सिंहासन पर बैठकर साक्षात् इंद्र की भांति शोभा पा रहा था।
किंतु उस दिव्य वैभव में एक बड़ा दोष था — क्योंकि शोभन ने वह व्रत श्रद्धा से नहीं, अपितु लोकलाज और विवशता में किया था, इसलिए वह देवपुरी ‘अस्थिर’ (नश्वर / क्षणभंगुर) थी, जो किसी भी क्षण विलीन हो सकती थी।
६. विप्र सोमशर्मा की तीर्थयात्रा और शोभन से भेंट
एक बार राजा मुचुकुंद के राज्य के निवासी परम ज्ञानी और वेदपाठी ब्राह्मण सोमशर्मा (Somsharma) तीर्थाटन करते हुए मंदराचल पर्वत के समीप पहुंचे। वहां उन्होंने पर्वत के शिखर पर इंद्रपुरी जैसी देदीप्यमान स्वर्ण नगरी देखी। कौतूहलवश जब वे नगर में प्रविष्ट हुए, तो उन्होंने राजसिंहासन पर आसीन राजा को ध्यान से देखा — वह कोई अन्य नहीं, अपितु मुचुकुंद का दामाद और चंद्रभागा का मृत पति शोभन था!
शोभन ने अपने ससुर के नगर के पूज्य ब्राह्मण को पहचान लिया। वह तत्काल सिंहासन से उतरा और सोमशर्मा के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। सोमशर्मा ने विस्मय से पूछा: “हे राजन! आपकी तो मुचुकुंद नगर में मृत्यु हो गई थी! आपको यह अलौकिक साम्राज्य कैसे मिला? और आपके मुख पर यह चिंता क्यों है?”
शोभन ने हाथ जोड़कर कहा: “हे महर्षि! यह समस्त ऐश्वर्य मुझे केवल एक बार रमा एकादशी का निराहार व्रत करने से प्राप्त हुआ है। किंतु मैंने वह व्रत अश्रद्धा और विवशता में किया था, अतः मेरी यह नगरी ‘अस्थिर’ है। यह कब लुप्त हो जाएगी, मैं नहीं जानता। आप कृपा करके मेरी पतिव्रता पत्नी चंद्रभागा को मेरा यह संदेश दीजिए। चंद्रभागा ने बाल्यावस्था से समस्त एकादशियों का निष्काम व्रत किया है। यदि वह अपने संचित पुण्यों का एक अंश मुझे समर्पित कर दे, तो मेरा यह राज्य स्थिर और अमर हो जाएगा!”
७. चंद्रभागा का महादान और राज्य की अमरता
ब्राह्मण सोमशर्मा तत्काल मुचुकुंद नगर लौटे और राजकुमारी चंद्रभागा को संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। अपने पति के जीवित होने और दिव्य नगरी में विराजमान होने की बात सुनकर चंद्रभागा आनंद से झूम उठी। उसने कहा: “हे विप्रदेव! मुझे अभी इसी क्षण मेरे पतिदेव के पास ले चलिए। मैं अपने जीवन भर की समस्त एकादशियों का पुण्य अपने स्वामी के चरणों में अर्पित करने को प्रस्तुत हूं।”
सोमशर्मा चंद्रभागा को लेकर मंदराचल की ओर चले। मार्ग में महर्षि वामदेव का आश्रम आया। वामदेव मुनि ने चंद्रभागा की निष्कलंक पतिभक्ति से प्रसन्न होकर वैदिक मंत्रों से उसका अभिषेक किया, जिससे चंद्रभागा का शरीर दिव्य, ज्योतिर्मय और अप्सराओं से भी अधिक सुंदर हो गया।
मंदराचल पहुंचकर जब चंद्रभागा अपने पति शोभन के सम्मुख उपस्थित हुई, तो शोभन ने भावविभोर होकर अपनी पत्नी को सिंहासन पर अपने वाम भाग (बाईं ओर) बैठाया। चंद्रभागा ने हाथ जोड़कर भगवान लक्ष्मीनारायण का ध्यान किया और कहा:
“हे प्रज्ञाचक्षु स्वामी! मैंने आठ वर्ष की आयु से लेकर आज तक जितनी भी एकादशियों का व्रत पूर्ण निष्ठा, नियम और भक्ति से किया है, उन समस्त एकादशियों का अक्षय पुण्यफल मैं आपको समर्पित करती हूं! मेरे इस पातिव्रत्य और एकादशी के तपोबल से आपका यह दिव्य राज्य स्थिर, अमर और अचल हो जाए!”
जैसे ही चंद्रभागा ने यह संकल्प छोड़ा, संपूर्ण मंदराचल पर्वत दिव्य शंखध्वनि और पुष्पवृष्टि से गूंज उठा! वह अस्थिर देवपुरी तत्क्षण अचल, अमर और वैकुंठ के समान अविनाशी बन गई! शोभन का स्वरूप साक्षात् कामदेव के समान देदीप्यमान हो गया। दोनों पति-पत्नी कल्पांत तक उस दिव्य नगरी में अखंड सुख भोगकर अंत में भगवान श्रीहरि के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त हुए।
८. रमा एकादशी की प्रामाणिक पूजन विधि एवं नियम
- दशमी का नियम: एकादशी से एक दिन पूर्व (दशमी की रात्रि) सात्त्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- प्रातः स्नान और संकल्प: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें, पीले वस्त्र धारण करें और भगवान लक्ष्मीनारायण के सम्मुख व्रत का संकल्प लें।
- लक्ष्मीनारायण पूजन: भगवान विष्णु और मां रमा (लक्ष्मी) की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। पीले पुष्प, तुलसीदल, चंदन, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। (स्मरण रहे कि एकादशी को तुलसीदल न तोड़ें, एक दिन पूर्व ही तोड़ लें)।
- मंत्र जप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं लक्ष्मीनारायणाय नमः” का कम से कम १०८ बार जप करें।
- रात्रि जागरण: रात्रि में दीपदान करें और भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें।
- द्वादशी पारण: द्वादशी के दिन प्रातः पुनः पूजन कर ब्राह्मण को भोजन, दान-दक्षिणा दें और शुभ मुहूर्त में पारण कर व्रत पूर्ण करें।
९. कहानी से मिलने वाली अमर शिक्षाएं (Moral Lessons)
- श्रद्धा ही भक्ति का प्राण है: शोभन ने विवशता में व्रत किया तो राज्य तो मिला किंतु अस्थिर रहा; जबकि चंद्रभागा की निष्काम और अटूट श्रद्धा ने उस राज्य को अमर कर दिया। कर्म में भाव ही प्रधान होता है।
- पारस्परिक समर्पण का आदर्श: पति-पत्नी एक-दूसरे के सुख-दुख के सच्चे भागीदार हैं। अपने पुण्यों से जीवनसाथी का उद्धार करना ही सनातन गृहस्थ धर्म का सर्वोच्च शिखर है।
- रमा एकादशी की महिमा: यह व्रत न केवल पापों का नाश करता है, अपितु जीवन में कभी धन-वैभव की कमी नहीं होने देता और अंत में मोक्ष प्रदान करता है।
बारंबार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न १: रमा एकादशी कब मनाई जाती है और इसका नाम ‘रमा’ क्यों है?
उत्तर: रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माता लक्ष्मी का एक नाम ‘रमा’ है, अतः इस दिन दोनों की संयुक्त कृपा पाने हेतु इसे रमा एकादशी कहा जाता है।
प्रश्न २: राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी का क्या नियम था?
उत्तर: राजा मुचुकुंद के राज्य में सभी मनुष्यों के साथ-साथ हाथी, घोड़े, गाय और बैलों को भी एकादशी के दिन अन्न-घास नहीं दिया जाता था; सभी के लिए उपवास अनिवार्य था।
प्रश्न ३: शोभन का अस्थिर राज्य किस प्रकार स्थाई हुआ?
उत्तर: राजकुमारी चंद्रभागा ने अपनी बाल्यावस्था से संचित समस्त एकादशियों का पुण्यफल अपने पति शोभन को अर्पित किया, जिससे मंदराचल की वह देवपुरी कल्पांत तक स्थाई और अमर हो गई।
प्रश्न ४: रमा एकादशी का व्रत करने से क्या फल मिलता है?
उत्तर: इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं, दरिद्रता दूर होकर अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और अंत में वैकुंठ लोक मिलता है।
कहानी की सीख
श्रद्धापूर्वक की गई भक्ति ही कर्मों को शाश्वत फल देती है। निष्काम प्रेम और पुण्य के समर्पण से जीवनसाथी का भी परम कल्याण होता है।