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राजा सूर्यसेन और न्यायप्रिय पंडित (King Suryasen and the Wise Sage)

🎭 મુખ્ય પાત્રો: राजा सूर्यसेन, पंडित दीनदयाल

राजा सूर्यसेन और न्यायप्रिय पंडित (King Suryasen and the Wise Sage)
અક્ષરનું માપ:

धर्मपुर नगर के महाराज सूर्यसेन बहुत ही न्यायप्रिय और दयालु राजा के रूप में जाने जाते थे। एक बार उनके राज्य में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। नगर के दो बड़े व्यापारी एक कीमती हीरे के मालिकाना हक के लिए आपस में लड़ रहे थे। दोनों ही यह दावा कर रहे थे कि यह हीरा उन्हीं का है। राज्य के न्यायाधीश भी सच्चाई का पता लगाने में असमर्थ साबित हुए।

राजा ने इस मामले को सुलझाने के लिए पंडित दीनदयाल नाम के एक ज्ञानी और न्यायी संत को दरबार में बुलाया। पंडित जी ने हीरे को ध्यान से देखा और दोनों व्यापारियों को अलग-अलग कमरों में भेज दिया। इसके बाद उन्होंने पहले व्यापारी से पूछा, “यदि यह हीरा तुम्हें सौंप दिया जाए, तो तुम राज्य की गरीब प्रजा के लिए क्या दान करोगे?” व्यापारी ने लालच में आकर कहा, “मैं सिर्फ अपना हीरा रखना चाहता हूँ, मैं कोई दान नहीं करूँगा।”

तत्पश्चात पंडित जी ने दूसरे व्यापारी से भी वही सवाल पूछा। उसने नम्रतापूर्वक कहा, “यह हीरा मेरा होने के बावजूद, यदि राज्य की भलाई और सुख-समृद्धि के लिए यह किसी के काम आ सके, तो मुझे हीरा खोने का कोई दुख नहीं होगा।” पंडित जी ने सभा में आकर घोषणा की कि हीरा दूसरे व्यापारी का ही है। उन्होंने राजा को समझाया कि सच्चा मालिक अपनी वस्तु के प्रति लगाव तो रखता है, लेकिन लालच से बड़ा दिल भी रखता है; जबकि झूठा आदमी केवल अपना स्वार्थ देखता है। राजा ने इस न्याय की मुक्तकंठ से सराहना की।

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વાર્તાનો બોધ (Moral of the Story)

सच्चाई और ईमानदारी के आगे बड़ा से बड़ा पद या सत्ता भी झुक जाती है।