राजा विक्रमसेन एक बहादुर शासक थे। लेकिन पड़ोसी देश की शक्तिशाली सेना के सामने वे लगातार छह बार युद्ध हार चुके थे। उनकी पूरी सेना बिखर गई थी और वे अपनी जान बचाने के लिए जंगल की एक अँधेरी गुफ़ा में छिपकर बैठे थे। राजा अत्यंत हताश थे और हिम्मत हार चुके थे।
वे गुफ़ा में बैठे थे, तभी उनकी नज़र पत्थर की दीवार पर चढ़ती हुई एक छोटी सी मक़ड़ी पर पड़ी। मक़ड़ी अपना जाला बनाने के लिए छत तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी। वह थोड़ी ऊपर तक चढ़ती और फिसलकर नीचे गिर जाती। ऐसा उसने एक के बाद एक नौ बार किया।
लेकिन दसवीं बार मक़ड़ी ने अपनी पूरी ताक़त जुटाई और दीवार पर चढ़कर छत तक पहुँचने में सफ़ल हो गई और एक सुंदर जाला बनाया। यह दृश्य देखकर राजा विक्रमसेन के हृदय में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने सोचा, “जब यह छोटा सा जीव हार नहीं मानता, तो मैं क्यों हिम्मत हार जाऊँ?” उन्होंने फिर से सेना इकट्ठी की और सातवीं बार में विजय प्राप्त की।