कपिंजल तीतर, शीघ्रग खरगोश और धूर्त तपस्वी बिलाव: पंचतंत्र की अमर नीति कथा, पाखंड का शिकार और दो की लड़ाई में तीसरे का लाभ
मुख्य पात्र: कपिंजल तीतर, शीघ्रग खरगोश, दधिकर्ण तपस्वी बिलाव
आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा रचित विश्वविख्यात नीतिशास्त्र ‘पंचतंत्र’ के तृतीय तंत्र ‘काकोलूकीयम’ (कौवे और उल्लू का युद्ध) में वर्णित “कपिंजल तीतर, शीघ्रग खरगोश और धूर्त तपस्वी बिलाव” (The Story of the Partridge, the Hare, and the Hypocrite Cat) की कथा नीति, विवेक, पारस्परिक विवाद के दुष्परिणाम और पाखंडी व्यक्तियों के कपट से सावधान रहने की एक अत्यंत मार्मिक और अमर गाथा है। लोक व्यवहार में अत्यंत प्रसिद्ध कहावत है: “दो की लड़ाई में तीसरे का लाभ”। जब दो पक्ष अपने तुच्छ अहंकार, हठ अथवा छोटे-मोटे विवाद के समाधान हेतु किसी अविश्वसनीय, कपटी और धूर्त मध्यस्थ के पास जाते हैं, तो न्याय मिलना तो दूर, दोनों पक्ष अपना सर्वस्व गंवा बैठते हैं। यह पौराणिक नीति कथा हमें यह अमर संदेश देती है कि केवल तिलक, माला या संन्यासी वेश धारण कर लेने से कोई व्यक्ति महात्मा नहीं बन जाता; जिसका मूल स्वभाव ही हिंसक और कुटिल हो, वह अवसर मिलते ही अपना वास्तविक रूप दिखा ही देता है।
१. कथा की पृष्ठभूमि और प्रमुख पात्रों का विस्तृत परिचय
एक अत्यंत सुंदर, सघन वन में पतितपावनी गंगा नदी के पावन तट पर एक विशाल और छायादार पीपल का वृक्ष स्थित था। इस कथा के प्रमुख पात्रों का परिचय एवं उनकी प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं:
- कपिंजल (Kapinjala): पीपल के वृक्ष के तने के खोखल (कोटर) में निवास करने वाला एक भोला-भाला, सीधा और शांत स्वभाव का तीतर पक्षी। वह वर्षों से उस वृक्ष में अपना घोंसला बनाकर सुखपूर्वक रह रहा था।
- शीघ्रग (Sighraga): वन का एक चंचल, हठी और वाकपटु खरगोश। रिक्त स्थान पर अनाधिकृत अधिकार जमाने और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए धर्मशास्त्र के नियमों की कुतर्कपूर्ण व्याख्या करने में वह अत्यंत कुशल था।
- दधिकर्ण (Dadhikarna): गंगा तट पर रहने वाला एक अत्यंत धूर्त, मक्कार, वृद्ध और कुटिल जंगली बिलाव। जब वृद्धावस्था के कारण वह शिकार करने में असमर्थ हो गया, तो उसने भोले-भाले जीवों को फंसाने के लिए एक परम तपस्वी साधु का ढोंग रच लिया था।
२. तीतर का सुदूर प्रवास और खरगोश द्वारा गृह पर अनाधिकृत अधिकार
कपिंजल तीतर पीपल के खोखल में बड़े आनंद से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। एक बार वर्षा ऋतु की समाप्ति के उपरांत, उसे सूचना मिली कि समीप के किसी बड़े कृषि क्षेत्र में पके हुए धान और गेहूं के दानों का विपुल भंडार है। कपिंजल अपने अन्य पक्षी मित्रों के साथ वहां दाना चुगने चला गया। वहां प्रचुर भोजन और अनुकूल वातावरण होने के कारण कपिंजल कई महीनों तक वहीं रुका रहा और अपने मूल निवास पर तुरंत न लौट सका।
इसी अंतराल में, वन में घूमता हुआ शीघ्रग नामक एक खरगोश उस पीपल के वृक्ष के पास आ पहुंचा। उसने देखा कि पीपल के तने का यह खोखल अत्यंत सुरक्षित, शीतल, वर्षा और धूप से सुरक्षित तथा पूर्णतः रिक्त है। किसी को वहां न पाकर खरगोश उस खोखल में रहने लगा और धीरे-धीरे उसने उसे अपना स्थायी घर बना लिया।
३. कपिंजल की वापसी और निवास को लेकर तीखा विवाद
कुछ महीनों के पश्चात जब कपिंजल तीतर हृष्ट-पुष्ट होकर अपने पुराने पीपल के कोटर में लौटा, तो उसने देखा कि उसके घर के भीतर एक खरगोश बड़े आराम से पैर फैलाकर सो रहा था! कपिंजल ने विस्मय और क्रोध से भरकर कहा: “अरे ओ खरगोश! यह कोटर मेरा पैतृक निवास है। मैं यहां वर्षों से रह रहा हूँ। मैं कुछ समय के लिए भोजन की खोज में बाहर गया था, इसलिए तुमने मेरे घर पर कब्जा कर लिया है। अब तुम भलमनसाहत से इस स्थान को खाली करो और कहीं अन्यत्र चले जाओ।”
शीघ्रग खरगोश ने अहंकार से अपनी गर्दन मटकाते हुए कहा: “अरे मूर्ख तीतर! तुम किस अधिकार से इस स्थान को अपना बता रहे हो? क्या तुम्हारे पास इस भूमि का कोई लिखित प्रमाण है? नीतिशास्त्र और स्मृति ग्रंथों का यह सर्वमान्य नियम है कि:
“वापीकूपतडागानां देवालयमहीरुहाम् ।
त्यक्ते स्वामिनि विज्ञेयं भोक्ता तत्त्वतो भवेत् ॥”
अर्थात्: “बावड़ी, कुआं, तालाब, देवालय अथवा वृक्ष का कोटर—जब इसका मूल स्वामी इसे त्याग कर दीर्घकाल के लिए चला जाता है, तब जो व्यक्ति वर्तमान में उसका उपभोग कर रहा होता है, वही उसका वास्तविक स्वामी माना जाता है! मैं यहाँ कई महीनों से निवास कर रहा हूँ, अतः यह घर अब मेरा है!”
कपिंजल ने प्रतिवाद किया: “मैं इस स्थान को सदा के लिए त्याग कर नहीं गया था, केवल भोजन हेतु अस्थायी प्रवास पर था। मेरी अनुपस्थिति का अनुचित लाभ उठाकर मेरे घर पर अधिकार जमाना घोर अन्याय और अधर्म है।” दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि वे एक-दूसरे पर झपटने लगे, किंतु शारीरिक रूप से दोनों में से कोई भी निर्णायक विजय प्राप्त न कर सका।
४. धर्मज्ञ मध्यस्थ की खोज और गंगा तट की ओर प्रस्थान
जब विवाद का कोई समाधान नहीं निकला, तब शीघ्रग खरगोश ने एक प्रस्ताव रखा: “हम दोनों के व्यर्थ विवाद करने से कुछ हासिल नहीं होगा। आओ, हम दोनों किसी ऐसे परम विद्वान, धर्मात्मा और नीतिशास्त्र के ज्ञाता महात्मा के पास चलें, जो निष्पक्ष होकर धर्मपूर्वक हमारे इस विवाद का निर्णय कर सके। उनका जो भी निर्णय होगा, वह हम दोनों को शिरोधार्य होगा।”
कपिंजल तीतर ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। दोनों किसी निष्पक्ष धर्मज्ञ की खोज में पावन गंगा नदी के तट की ओर चल पड़े। चलते-चलते उन्होंने गंगा की रेती पर एक अत्यंत विचित्र और विस्मयकारी दृश्य देखा।
૫. धूर्त तपस्वी बिलाव (दधिकर्ण) का पाखंड और कपट वेश
गंगा के तट पर ‘दधिकर्ण’ नामक एक अत्यंत चालाक और वृद्ध जंगली बिलाव बैठा हुआ था। उसने एक सिद्ध तपस्वी का वेश धारण कर रखा था! वह कुशा के आसन पर एक पैर से खड़ा था, दोनों हाथ जोड़कर सूर्यदेव की ओर मुख किए हुए था, गले में रुद्राक्ष की बड़ी-बड़ी मालाएं थीं, मस्तक पर भस्म और त्रिपुंड चंदन का तिलक लगा था, और नेत्र अर्ध-उन्मीलित कर वह मंद स्वर में गायत्री मंत्र का जप करने का नाटक कर रहा था!
वास्तव में वह बिलाव अत्यंत बूढ़ा हो चुका था। उसके दांत कमजोर हो चुके थे और दौड़कर शिकार पकड़ने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी। इसलिए उसने जीव-हत्या त्यागने का झूठा नाटक रचकर भोले-भाले पक्षियों और छोटे पशुओं को अपने पास बुलाकर उनका शिकार करने का यह कुचक्र रचा था।
खरगोश ने दूर से बिलाव को देखा और भयभीत होकर रुक गया: “कपिंजल! तनिक देखो, वह तो बिलाव है! बिलाव तो हमारी जाति का जन्मजात शत्रु है। हमें किसी हिंसक पशु के समीप कदापि नहीं जाना चाहिए।”
किंतु कपिंजल ने बिलाव की मुद्रा देखकर कहा: “भाई शीघ्रग! तनिक ध्यान से देखो, वह कोई साधारण बिलाव नहीं, अपितु गंगा तट पर तपस्या करने वाला कोई सिद्ध संत प्रतीत होता है! उसने एक पैर पर खड़े होकर सूर्य की उपासना की है और रुद्राक्ष धारण किया है। निश्चय ही उसने हिंसा का त्याग कर अहिंसा का व्रत ले लिया है। आओ, हम सुरक्षित दूरी से ही उसे अपना धर्मसंकट बताएं।”
६. बिलाव का मीठा धर्मोपदेश और दोनों का भ्रमित होना
कपिंजल और शीघ्रग ने कुछ दूरी पर खड़े होकर उच्च स्वर में निवेदन किया: “हे परम तपस्वी महात्मा! हम दोनों अपने निवास स्थान को लेकर एक गंभीर धर्मसंकट में पड़े हैं। आप नीति और धर्मशास्त्र के ज्ञाता जान पड़ते हैं। कृपया हमारे विवाद का निष्पक्ष न्याय कीजिए। हममें से जो दोषी हो, उसे आप दंडित करें और जो निर्दोष हो, उसे उसका अधिकार दिलाएं।”
बिलाव ने जब देखा कि दो स्वादिष्ट शिकार स्वयं चलकर उसके द्वार पर आ गए हैं, तो उसके मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। किंतु उसने अपने मुख पर परम वैराग्य, करुणा और सात्विकता का भाव बनाए रखा। उसने अत्यंत कांपती और मधुर वाणी में कहा:
“अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणिषु संयमः ।
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ॥”
अर्थात्: “हे प्रिय बालकों! अहिंसा ही इस संपूर्ण जगत का सर्वोच्च धर्म है। यह नश्वर देह आज है, कल नष्ट हो जाएगी। धन और यौवन कभी स्थायी नहीं रहते। केवल धर्म ही जीवात्मा के साथ परलोक जाता है। मैंने घोर तपस्या द्वारा जीव-हिंसा का सर्वथा त्याग कर दिया है और समस्त प्राणियों में ईश्वर का दर्शन करता हूँ। मैं किसी को दंड देने या आहत करने का सामर्थ्य नहीं रखता, किंतु धर्मशास्त्र के आधार पर सत्य निर्णय अवश्य सुना सकता हूँ।”
बिलाव के मुख से ऐसे उच्च कोटि के आध्यात्मिक विचार और वेदों के श्लोक सुनकर तीतर और खरगोश का संपूर्ण संशय और भय समाप्त हो गया। वे सोचने लगे कि ऐसा पवित्र आत्मा कभी किसी का अहित नहीं कर सकता।
७. बहरेपन का धूर्त नाटक और दोनों का करुण संहार
तभी उस मक्कार बिलाव ने अपनी अंतिम और सबसे घातक चाल चली। उसने अपना एक पंजा कान पर रखा और अत्यंत दीन स्वर में बोला: “हे वत्सो! वृद्धावस्था और निरंतर तपस्या के कारण मेरी दृष्टि अत्यंत क्षीण हो चुकी है और मेरे कान पूरी तरह बहरे हो चुके हैं! तुम दोनों इतनी दूर खड़े होकर बोल रहे हो कि मुझे तुम्हारा एक भी शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहा है! यदि तुम सचमुच धर्मसम्मत न्याय चाहते हो, तो निर्भय होकर बिल्कुल मेरे समीप आ जाओ और मेरे कान के पास आकर धीरे से अपना पक्ष कहो, ताकि मैं समझकर उचित निर्णय दे सकूँ।”
दुर्भाग्यवश, कपिंजल तीतर और शीघ्रग खरगोश बिलाव के उस पाखंडी वेश और मीठी वाणी से पूरी तरह सम्मोहित हो चुके थे। उन्होंने अपनी स्वाभाविक सतर्कता और आत्मरक्षा का विवेक त्याग दिया। दोनों मूर्ख बिना किसी संकोच के बिलाव के दोनों पंजों के ठीक बीच में जा खड़े हुए और उसके कानों के पास मुंह ले जाकर अपना विवाद सुनाने लगे।
बस, ठीक उसी क्षण तपस्वी के वेश में छिपे उस खूंखार बिलाव ने विद्युत गति से झपट्टा मारा! उसने अपने एक भारी पंजे से खरगोश की रीढ़ तोड़ दी और अपने नुकीले जबड़ों से तीतर की गर्दन मरोड़ डाली! पलक झपकते ही दोनों के प्राण पखेरू उड़ गए और धूर्त बिलाव उन दोनों को मारकर शांतिपूर्वक अपना आहार बना गया!
૮. पात्रों, प्रतीकों और परिणामों की विश्लेषणात्मक तालिका
| पात्र / प्रतीक | कथा में भूमिका | नैतिक एवं व्यावहारिक संदेश |
|---|---|---|
| कपिंजल तीतर | मूल स्वामी किंतु असावधान पक्षी | अपने अधिकार की रक्षा हेतु शत्रु की धूर्तता को अनदेखा करना प्राणघाती सिद्ध होता है। |
| शीघ्रग खरगोश | अनाधिकृत कब्जा करने वाला हठी जीव | पराई संपत्ति हड़पने की कुचेष्टा अंततः स्वयं के विनाश का मार्ग प्रशस्त करती है। |
| दधिकर्ण बिलाव | पाखंडी, ढोंगी और हिंसक साधु | धर्म के बाह्य आवरण और मीठे वचनों की आड़ में छिपे समाज के धूर्त तत्वों का प्रतीक। |
| गंगा तट एवं कुशा | पवित्रता का दुरुपयोग | पाखंडी व्यक्ति अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए धार्मिक प्रतीकों की आड़ लेते हैं। |
| आपसी विवाद | दो जीवों का संकीर्ण अहंकार | पारस्परिक कलह में जब किसी धूर्त तीसरे को पंच बनाया जाता है, तो दोनों नष्ट हो जाते हैं। |
९. इस अमर नीति कथा से मिलने वाली ७ शाश्वत जीवन शिक्षाएं
- दो की लड़ाई में तीसरे का लाभ: परिवार, व्यापार अथवा समाज के आपसी मतभेदों को आपस में बैठकर ही सुलझाना चाहिए; किसी पराये या संदिग्ध व्यक्ति को मध्यस्थ बनाने से सर्वनाश होता है।
- जन्मजात शत्रु पर कभी विश्वास न करें: बिलाव का स्वभाव ही हिंसा और शिकार करना है; बाह्य वेश बदल जाने से किसी का आंतरिक स्वभाव कभी नहीं बदलता।
- बाह्य धार्मिक पाखंड से सावधान: तिलक, माला अथवा गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने से कोई संत नहीं हो जाता; व्यक्ति के आचरण और चरित्र की परीक्षा आवश्यक है।
- अहंकार और हठ का त्याग: यदि तीतर और खरगोश थोड़ा-सा समझौता कर लेते और मिल-बांटकर रह लेते, तो दोनों के प्राण बच सकते थे। हठ विनाशकारी है।
- अति-मीठी वाणी में छिपा विष: जो व्यक्ति आवश्यकता से अधिक चापलूसी करे और धर्म की बड़ी-बड़ी बातें बघारे, उसके गुप्त मंतव्य के प्रति सदा सतर्क रहें।
- मध्यस्थ का चयन अत्यंत सावधानी से करें: किसी भी न्याय या निर्णय हेतु केवल निष्पक्ष, सत्यनिष्ठ और चरित्रवान व्यक्ति की ही शरण लेनी चाहिए।
- विवेक और सतर्कता की रक्षा: संकट या शंका के समय सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है; अंधविश्वास मृत्यु का आमंत्रण है।
१०. उपसंहार एवं समकालीन समाज में प्रासंगिकता
पंचतंत्र की “कपिंजल तीतर, शीघ्रग खरगोश और धूर्त तपस्वी बिलाव” की यह कथा आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही सत्य और प्रासंगिक है जितनी सदियों पूर्व थी। आज समाज में धर्म, परोपकार, समाज सेवा और मध्यस्थता के नाम पर कई ‘दधिकर्ण बिलाव’ सक्रिय हैं, जो परस्पर विवाद करने वाले भोले-भाले नागरिकों को अपने मीठे प्रपंच में फंसाकर उनका सर्वस्व लूट लेते हैं। यदि हमें अपने जीवन, सम्मान और संपत्ति की रक्षा करनी है, तो हमें अपने आंतरिक कलह को समाप्त करना होगा और धूर्त ढोंगियों के पाखंड को पहचानकर उनसे सदा सुरक्षित दूरी बनाए रखनी होगी।
कहानी की सीख
दो की लड़ाई में तीसरे का लाभ। जन्मजात शत्रु और पाखंडी साधु वेशधारी मध्यस्थ पर कभी अंधविश्वास न करें, अन्यथा दोनों पक्षों का सर्वनाश निश्चित है।