एक गाँव में रामू और शामू नाम के दो दृष्टिहीन (अंधे) मित्र रहते थे। भले ही वे देख नहीं सकते थे, फिर भी वे एक-दूसरे के सहारे सुख-दुख बाँटते थे। एक दिन दोनों बाज़ार से वापस लौट रहे थे, तभी रामू का पैर मिट्टी के एक घड़े से टकराया।
उन्होंने छूकर देखा तो घड़े में सोने के सिक्के थे। दोनों बहुत खुश हुए। रामू के मन में पाप आ गया। उसने सोचा, “शामू अंधा है, उसे पता नहीं चलेगा कि घड़े में कितना सोना है। मैं ज़्यादा सोना छिपा लेता हूँ।” उसने शामू को धोखा देकर बड़ा हिस्सा अपने घर में छिपा दिया।
गाँव के एक साधु महाराज ने यह चालाकी देख ली। उन्होंने रामू के घर से सोना निकालकर रास्ते में बेकार पत्थर रख दिए। जब रामू ने सिक्के निकालने के लिए थैली खोली तो उसमें से सिर्फ़ काले पत्थर निकले।
साधु महाराज ने रामू को बुलाकर कहा, “दूसरों को धोखा देने वाला भगवान की नज़र से बच नहीं सकता। तुमने अपने मित्र के साथ छल किया, इसलिए तुम्हारा धन पत्थर बन गया।” रामू ने पछतावा करते हुए शामू से माफ़ी माँगी।