एक जंगल में गजराज नाम का एक बहुत ही विशाल और आलसी हाथी रहता था। वह पूरा दिन नदी किनारे कीचड़ में पड़ा रहता और जंगल के छोटे-छोटे पक्षियों और जानवरों को परेशान करता था। हाथी को लड़ाई में हराना असंभव था, इसलिए सभी उससे दूर ही रहते थे।
एक छोटे से खरगोश ने गजराज का यह घमंड तोड़ने का निश्चय किया। वह हाथी के पास गया और गंभीर आवाज़ में बोला, “हे गजराज, चंद्रदेव आपके इस व्यवहार से बहुत क्रोधित हैं। उन्होंने मुझे अपना दूत बनाकर भेजा है। यदि आप उनसे माफ़ी नहीं माँगेंगे, तो वे नदी का पानी ज़हरीला कर देंगे।” हाथी को पहले तो विश्वास नहीं हुआ।
खरगोश रात के समय हाथी को नदी किनारे ले गया। नदी के शांत पानी में पूर्णिमा के चाँद का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था। खरगोश ने कहा, “देखिए, चंद्रदेव क्रोध से काँप रहे हैं।” जैसे ही हाथी ने अपनी सूँड पानी में डाली, पानी की लहरों के कारण चाँद का प्रतिबिंब हिलने लगा। यह देखकर अहंकारी हाथी बुरी तरह डर गया और उसने चंद्रदेव से माफ़ी माँग ली। इसके बाद उसने छोटे जानवरों को सताना हमेशा के लिए छोड़ दिया।