एक विशाल, घने और अत्यंत रमणीय जंगल में जहाँ चारों ओर रंग-बिरंगे सुगंधित फूल खिले रहते थे, बहुत सारे पक्षी आपस में मिल-जुलकर खुशी-खुशी रहते थे। उसी जंगल के ठीक बीचों-बीच एक विशालकाय और हरा-भरा बरगद का पेड़ था। उस बरगद के पेड़ की ऊंची डालियों पर ‘कालू’ नाम का एक काला कौआ और ‘मीठू’ नाम का एक बेहद सुंदर हरा तोता अपना-अपना घोंसला बनाकर निवास करते थे।
कालू कौआ अपनी चालाकी, तेज़ी और होशियारी पर बहुत ज्यादा घमंड करता था। वह हमेशा जंगल के छोटे-छोटे पक्षियों जैसे गौरैया, कबूतर और बुलबुल को नीचा दिखाने का प्रयास करता था और खुद को जंगल का सबसे चतुर पक्षी मानता था। जब भी कोई पक्षी भोजन या पानी जुटाने के लिए कड़ी मेहनत करता, कालू उनका मज़ाक उड़ाया करता था। दूसरी तरफ, मीठू तोता स्वभाव से बहुत ही शांत, विनम्र, दयालु और समझदार था। उसे अपनी बुद्धिमत्ता पर ज़रा भी अहंकार नहीं था और वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था।
एक बार की बात है, भीषण ग्रीष्म ऋतु का आगमन हुआ। सूरज की तपिश इतनी तेज़ थी कि आसमान से मानो आग के गोले बरस रहे हों। कड़कड़ाती धूप के कारण जंगल के सारे तालाब, नदियाँ, झरने और छोटे-छोटे गड्ढे पूरी तरह सूखकर पपड़ी बन गए। चारों तरफ पानी का भयंकर संकट पैदा हो गया। जंगल के तमाम पक्षी और पशु प्यास के मारे व्याकुल होकर इधर-उधर भटकने लगे। पक्षी पानी की एक-एक बूंद के लिए दूर-दूर तक उड़ते, लेकिन उन्हें कहीं भी जलाशय का नामोनिशान नहीं मिलता था।
पानी की तलाश में कालू कौआ उड़ते-उड़ते जंगल के किनारे बने एक पुराने मकान के आंगन में पहुँचा। कालू को आंगन के एक कोने में मिट्टी का एक पुराना घड़ा रखा दिखाई दिया। कालू उम्मीद से भरकर तुरंत घड़े के मुहाने पर जाकर बैठ गया। जब उसने घड़े के अंदर झांका, तो उसे नीचे थोड़ा सा पानी दिखाई दिया। कालू ने अपनी चोंच अंदर डालकर पानी पीने का प्रयास किया, लेकिन पानी बहुत गहराई में होने के कारण उसकी चोंच वहाँ तक नहीं पहुँच पाई।
कालू सोचने लगा कि अब क्या किया जाए। उसे अचानक बचपन में सुनी हुई कौए और कंकड़ वाली कहानी याद आ गई। उसने आसपास देखा तो ज़मीन पर छोटे-छोटे कंकड़ बिखरे पड़े थे। कालू ने अपनी चोंच से एक-एक कंकड़ उठाकर घड़े में डालना शुरू कर दिया। लेकिन धूप बहुत तेज़ थी और घड़ा काफी बड़ा था। सैकड़ों कंकड़ डालने के बाद भी पानी ऊपर नहीं आ सका। कालू कौआ अत्यधिक परिश्रम करने के कारण बुरी तरह थककर चूर हो गया और प्यास से उसका गला सूखने लगा।
ठीक उसी समय मीठू तोता भी पानी की खोज में उड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा। मीठू ने घड़े के पास कालू को बदहवास और थका हुआ देखा। स्थिति को समझते ही मीठू ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और विवेक का प्रयोग किया। उसने आंगन में चारों ओर देखा तो कचरे के ढेर के पास एक लंबी और पतली प्लास्टिक की स्ट्रॉ (नली) पड़ी दिखाई दी।
मीठू तोते ने तुरंत अपनी चोंच से उस स्ट्रॉ को उठाया और घड़े के अंदर गहराई तक सही तरीके से डाल दिया। इसके बाद मीठू ने उस स्ट्रॉ के सहारे बड़ी आसानी से घड़े के पेंदे में जमा शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझा ली!
कालू कौआ यह सब देखकर हैरान रह गया। जिस काम के लिए वह घंटों से हाड़-तोड़ मेहनत कर रहा था और कंकड़ ढो-ढोकर बेहाल हो चुका था, उस काम को मीठू तोते ने अपनी सूझ-बूझ और नई सोच से मात्र दो मिनट में पूरा कर दिखाया था।
मीठू तोते ने बहुत ही प्यार और विनम्रता से कालू से कहा, “कालू भाई! केवल पुरानी घिसी-पिटी मेहनत या अपनी चालाकी का ढिंढोरा पीटने से सफलता नहीं मिलती। सच्ची बुद्धिमत्ता तो समय और परिस्थिति के अनुसार नई सोच अपनाने और धैर्य रखने में है। आओ, तुम भी इस नली के सहारे जी भरकर पानी पी लो।”
कालू कौए को अपनी भूल और अहंकार पर बहुत पछतावा हुआ। उसने समझ लिया कि केवल चालाकी का दिखावा करने से कोई ज्ञानी नहीं बनता, बल्कि नम्रता और सही समय पर सही बुद्धि का प्रयोग ही असली सफलता की कुंजी है। कालू ने मीठू का धन्यवाद किया और दोनों ने तृप्त होकर पानी पिया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में जब भी कोई कठिन समस्या सामने आए, तो घबराने या अहंकार करने के बजाय शांति, विवेक और नई सोच के साथ काम लेना चाहिए। बुद्धि और समझदारी से बड़े से बड़े संकट को भी आसानी से दूर किया जा सकता है।