जयपुर नगर में हरिप्रसाद नाम का एक ईमानदार तेल का व्यापारी रहता था। वह यात्रा पर जाने से पहले अपने पड़ोसी देवदत्त को कीमती सुगंधित तेल से भरा एक बड़ा मिट्टी का डिब्बा देखभाल के लिए सौंप गया। उस समय देवदत्त बहुत भरोसेमंद लगता था।
यात्रा से वापस आने के बाद जब हरिप्रसाद ने अपना तेल का डिब्बा वापस माँगा, तब देवदत्त ने तेल निकाल लिया था और उसमें सस्ता पानी भर दिया था। उसने हरिप्रसाद पर ही झूठा आरोप लगाया कि डिब्बा पहले से ही ऐसा था। हरिप्रसाद न्याय पाने के लिए अदालत गया। न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और तेल के डिब्बे को मँगवाया।
न्यायाधीश ने डिब्बे के पेंदे (निचले हिस्से) में जमी तेल की चिकनाई और धूल की जाँच करने के लिए एक विशेषज्ञ रसायनशास्त्री (केमिस्ट) को बुलाया। परीक्षण से यह साबित हो गया कि डिब्बे में जो तेल था, वह पाँच महीने पुराना और मूल्यवान था, जबकि फिलहाल भरा गया पानी/तेल हाल ही में बदला गया था। देवदत्त पकड़ा गया और उसे अपनी चोरी क़बूल करनी पड़ी। न्यायाधीश ने हरिप्रसाद को उसका कीमती तेल वापस दिलवाया और देवदत्त को सजा सुनाई।