एक छोटे से नगर में लालजी नाम का एक दर्जी रहता था। लालजी बहुत ही मेहनती, दयालु और शत-प्रतिशत ईमानदार था। वह कभी कपड़े सीते समय कपड़े की चोरी नहीं करता था और सबके साथ मीठा व्यवहार करता था।
एक दिन लालजी की दुकान पर एक वृद्ध दयालु साधु आए। साधु के कपड़े फटे हुए थे। लालजी ने प्रेम से साधु को बैठाया और मुफ़्त में उनके लिए एक सुंदर नया कुर्त्ता सी दिया। साधु लालजी की ईमानदारी से प्रसन्न हुए और उसे एक जादुई सुनहरे धागे की रील देकर कहा, ‘इस धागे से तुम जो भी कपड़ा सीओगे, वह कभी फटेगा नहीं और पहनने वाले को असीम सुख मिलेगा।’
लालजी ने उस धागे से गरीबों और राजा के लिए सुंदर कपड़े सिए। उसकी दुकान की ख्याति पूरे राज्य में फैल गई। लालजी ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा गरीबों की सेवा में लगाया और जीवन भर सुखी रहा।