युवा नरेन्द्रनाथ (जो बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए) सत्य की खोज में भटक रहे थे। वे जिस भी विद्वान से मिलते, उनसे एक ही प्रश्न पूछते, ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ बहुत कम लोगों के पास इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर था।
जब नरेन्द्र दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण परमहंस से मिले और यही प्रश्न पूछा, तो गुरु रामकृष्ण जी ने मुस्कुराकर कहा, ‘हाँ नरेन्द्र! मैंने ईश्वर को देखा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ!’
गुरु रामकृष्ण जी के एक ही स्पर्श और दिव्य ज्ञान से नरेन्द्र का हृदय परिवर्तित हो गया। गुरु ने नरेन्द्र को स्वामी विवेकानंद बनाया और पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति तथा मानव सेवा का संदेश फैलाया। गुरु पूर्णिमा 2026 के पावन अवसर पर विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की यह कहानी गुरु-शिष्य के पवित्र संबंध का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है।