विजयनगर के महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में एक दिन किसी अन्य प्रदेश से तीन पंडित आए। वे खुद को सभी वेदों और पुराणों का ज्ञाता मानते थे और उन्हें इस बात का बहुत घमंड था। उन्होंने दरबार के सभी ज्ञानियों को पराजित करने की घोषणा कर दी।
महाराज ने चतुर तेनालीराम को उनके सामने खड़ा किया। तेनालीराम एक कपड़े में बँधी हुई कोई वस्तु लेकर दरबार में आए और बोले, “हे विद्वान पंडितों! यदि आप इस कपड़े में बँधे महान ग्रंथ पर शास्त्रार्थ करके मुझे हरा देंगे, तो हम अपनी हार स्वीकार कर लेंगे।”
पंडितों ने पूछा, “यह कौन सा ग्रंथ है?” तेनाली ने कहा, “यह है ‘तिलकाष्ठ-महिष-बंधनम्’!” पंडितों ने ऐसा कोई ग्रंथ कभी नहीं पढ़ा था, इसलिए वे घबरा गए और शर्म से अपनी हार स्वीकार करके रात में ही नगर छोड़कर भाग गए। सुबह महाराज ने तेनाली से पूछा कि उस कपड़े में कौन सा गुप्त ग्रंथ था? तेनाली ने कपड़ा खोलकर दिखाया तो अंदर तिल की लकड़ी का एक टुकड़ा और भैंस बाँधने की रस्सी थी! संस्कृत में ‘तिलकाष्ठ’ यानी तिल की लकड़ी और ‘महिष-बंधनम्’ यानी भैंस बाँधने की रस्सी! यह सुनते ही पूरा दरबार हँस पड़ा।