एक सुंदर झील के किनारे बनी छोटी सी झोपड़ी में ‘रामू’ नाम का एक गरीब मछुआरा अपने परिवार के साथ रहता था। रामू रोज सुबह झील में जाल डालकर मछलियां पकड़ता और उन्हें बाज़ार में बेचकर बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का गुजारा चलाता था।
उस झील में एक अत्यंत दिव्य और अद्भुत ‘सुनहरा हंस’ रहता था। वह कोई साधारण हंस नहीं था, बल्कि उसके पंखों के पंख शुद्ध सोने के बने हुए थे। वह सुनहरा हंस स्वभाव से बहुत दयालु था। उसने रामू मछुआरे की गरीबी और कड़ी मेहनत को देखा।
एक दिन सुनहरा हंस रामू के पास आया और मधुर वाणी में बोला, “रामू! तुम अपनी गरीबी से दुखी मत हो। मैं हर सप्ताह तुम्हारी झोपड़ी पर आकर अपने पंख से सोने का एक पंख तुम्हें दे दिया करूँगा। तुम उसे बाज़ार में बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण अच्छे से कर सकते हो।”
रामू यह सुनकर बहुत खुश हुआ। अगले ही सप्ताह सुनहरा हंस आया और उसने अपनी पाँख से सोने का एक पंख रामू को दे दिया। रामू ने उस सोने के पंख को बेचकर ढेर सारे रुपये कमाए। धीरे-धीरे रामू के परिवार की गरीबी दूर हो गई।
लेकिन जैसे-जैसे रामू के पास धन बढ़ता गया, वैसे-वैसे उसके मन में लालच का राक्षस जाग उठा। रामू सोचने लगा, “यह हंस हर हफ्ते केवल एक ही सोने का पंख देता है। यदि किसी दिन यह हंस उड़ गया, तो मुझे फिर से गरीब होना पड़ेगा! इससे अच्छा है कि मैं इस हंस को पकड़ लूँ और उसके शरीर के सारे सोने के पंख एक साथ खींच लूँ, तो मैं रातों-रात राजा जैसा अमीर बन जाऊँगा!”
रामू की पत्नी ने उसे समझाया कि, “हंस हमारा दयालु मित्र है, उसके साथ ऐसा धोखा मत करो।” लेकिन लालच में अंधे रामू ने किसी की बात नहीं सुनी।
अगले सप्ताह जब सुनहरा हंस विश्वासपूर्वक रामू के आंगन में आया, तो रामू ने छिपकर जाल फेंका और हंस को दबोच लिया। रामू ने अधीर होकर हंस के शरीर से सारे सोने के पंख एक-एक करके बलपूर्वक उखाड़ लिए।
लेकिन यह क्या! जैसे ही पंख हंस के शरीर से अलग हुए, वैसे ही एक चमत्कार हुआ! वे सोने के पंख साधारण सफेद पंखों में बदल गए! हंस का सारा सोना गायब हो गया।
सुनहरे हंस ने दुखी होकर कहा, “रामू! तुम्हारे लालच और धोखे के कारण तुमने हमेशा के लिए सोने के पंख खो दिए हैं। जो इंसान दया और मित्रता का द्रोह करता है, उसे अंत में कुछ नहीं मिलता।” ऐसा कहकर हंस उड़ गया और फिर कभी वापस नहीं आया।
रामू के हाथ में केवल बेकार के सफेद पंख बचे। रामू अपना सिर पकड़कर रोने लगा, लेकिन अब पछताने से क्या फायदा था?