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गोपाल कृष्ण गोखले: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान उदारवादी नेता

गोपाल कृष्ण गोखले: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान उदारवादी नेता
અક્ષરનું માપ:

भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक पुनर्जागरण के इतिहास में गोपाल कृष्ण गोखले का स्थान अत्यंत सम्माननीय है। वे एक प्रखर उदारवादी राष्ट्रवादी नेता, समाजसुधारक, अर्थशास्त्री और महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे।

गोखले का मानना था कि भारत को स्वशासन और स्वतंत्रता की ओर ले जाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा, सामाजिक सुधार, आर्थिक आत्मनिर्भरता और संवैधानिक मार्ग अत्यंत आवश्यक हैं।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोटलुक गांव में हुआ था। सामान्य आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उनके परिवार ने शिक्षा को प्राथमिकता दी। गोखले बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। उन्होंने कोल्हापुर की राजाराम कॉलेज और मुंबई की एलफिंस्टन कॉलेज से 1884 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

शिक्षक और समाजसेवक के रूप में करियर

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गोखले पुणे की फर्ग्यूसन कॉलेज में अंग्रेजी और अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बने। वे न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे के विचारों से बहुत प्रभावित हुए और रानाडे को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे। गोखले ने सार्वजनिक सभाओं और सामाजिक सुधार के कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

कांग्रेस के नेता और उदारवादी विचारधारा

1889 में गोखले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। वे कांग्रेस के नरमपंथी गुट के प्रमुख नेताओं में से एक बने। गोखले ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीयों के अधिकारों, शिक्षा के प्रसार और आर्थिक सुधारों के लिए तर्कपूर्ण तथा सटीक आंकड़ों के साथ अपनी बात रखते थे।

सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी

12 जून 1905 को गोखले ने पुणे में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ऐसे धर्मनिरपेक्ष और अनुशासित कार्यकर्ताओं को तैयार करना था, जो देशसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकें। इन कार्यकर्ताओं ने शिक्षा, दलित उत्थान और समाजसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

गांधीजी के राजनीतिक गुरु

महात्मा गांधी गोपाल कृष्ण गोखले को अपने राजनीतिक गुरु मानते थे। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के दौरान गोखले ने गांधीजी को अपना पूर्ण समर्थन दिया और 1912 में दक्षिण अफ्रीका का दौरा भी किया। 1915 में जब गांधीजी भारत लौटे, तब गोखले ने उन्हें सलाह दी कि वे पहले एक वर्ष तक पूरे भारत का भ्रमण करें और देश की वास्तविक परिस्थितियों को समझें।

उपसंहार

19 फरवरी 1915 को मात्र 48 वर्ष की आयु में गोपाल कृष्ण गोखले का निधन हो गया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देश की सेवा केवल आंदोलनों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि शिक्षा, संयम, ज्ञान, चरित्र निर्माण और सामाजिक सुधार के माध्यम से भी की जा सकती है।