एक नगर में हरिदास नाम का एक बड़ा व्यापारी रहता था। एक दिन बाज़ार से घर लौटते समय उसकी सोने के सिक्कों से भरी थैली कहीं गिर गई। उस थैली में पूरे सौ सोने के सिक्के थे। व्यापारी ने पूरे नगर में घोषणा करवाई कि जिस किसी को भी वह थैली मिलेगी, उसे दस सोने के सिक्के इनाम में दिए जाएँगे।
एक ग़रीब लेकिन अत्यंत ईमानदार लड़के को रास्ते में वह थैली मिली। वह सीधा व्यापारी के पास गया और उसे थैली सौंप दी। व्यापारी ने सिक्के गिने, वे पूरे सौ थे। लेकिन अब व्यापारी के मन में लालच आ गया। वह लड़के को इनाम के दस सिक्के देना नहीं चाहता था।
उसने लड़के पर झूठा आरोप लगाते हुए कहा, “इस थैली में तो ११० (110) सिक्के थे, तुमने इसमें से पहले ही १० (10) सिक्के निकाल लिए हैं, इसलिए तुम्हें कोई इनाम नहीं मिलेगा।” ग़रीब लड़का दुखी हुआ और न्याय पाने के लिए न्यायाधीश के पास गया।
बुद्धिमान न्यायाधीश व्यापारी की चालाकी समझ गए। उन्होंने व्यापारी से कहा, “अगर तुम्हारी थैली में ११० सिक्के थे, तो यह १०० सिक्कों वाली थैली तुम्हारी नहीं है। जब तक इसका सही मालिक नहीं मिल जाता, तब तक यह थैली इस लड़के की ही है!” व्यापारी को अपने लालच की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी।