एक बाड़े में ‘लालचंद’ और ‘कालू’ नाम के दो मुर्गे रहते थे। दोनों खुद को सबसे श्रेष्ठ मानते थे।
एक दिन दोनों में लड़ाई हुई। लालचंद जीत गया और कालू हारकर कोने में छिप गया।
जीता हुआ लालचंद घमंड में भरकर बाड़ की ऊँची दीवार पर चढ़ गया और ज़ोर-ज़ोर से कूकने लगा, “मैं ही यहाँ का राजा हूँ!”
तभी आकाश में उड़ते एक शिकारी चील की नज़र दीवार पर कूकते घमंडी लालचंद पर पड़ी। चील ने झपट्टा मारकर लालचंद को दबोच लिया और उड़ गया!
कोने में बैठा नम्र कालू सुरक्षित बच गया।
यह कहानी सिखाती है कि जीत के बाद भी कभी घमंड नहीं करना चाहिए।
अहंकार का त्याग और नम्रता की सुरक्षा:
मुर्गों और चील की यह पंचतंत्र कथा बच्चों को सिखाती है कि किसी भी सफलता के बाद घमंड नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति अहंकार में अंधा होकर अपनी प्रशंसा के गीत गाता है, वह आने वाले संकट को देख नहीं पाता। नम्रता और विवेक ही इंसान को सुरक्षित रखते हैं।
कहानी की मुख्य सीख और जीवन मूल्य:
1. कभी भी सत्य और ईमानदारी का मार्ग न छोड़ें।
2. विपत्ति के समय धैर्य, शांति और विवेक से काम लें।
3. दूसरों के दुख में सहानुभूति दिखाएं और यथासंभव मदद करें।
4. समय का आदर करें और आलस त्यागकर कठिन परिश्रम करें।
5. संकट के समय एकता और आपसी सहयोग ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।
कहानी का नैतिक और मानसिक संदेश:
यह पवित्र और शिक्षाप्रद कहानी बच्चों के मानसिक और नैतिक विकास में अद्भुत संस्कारों का सिंचन करती है। जब मन में सत्य, ईमानदारी, धैर्य, विनय और साहस जैसे सद्गुण होते हैं, तो जीवन की हर कठिन परिस्थिति से बाहर निकलने का सुंदर मार्ग अपने आप मिल जाता है। सज्जनता, परोपकार, नम्रता और प्रभु-भक्ति ही हमारी सच्ची संपत्ति है। हर बच्चे को ऐसी सुंदर कहानियाँ पढ़कर अपने जीवन को सुंदर और उज्ज्वल बनाना चाहिए।
जब बच्चे ऐसी दिव्य और प्रेरणादायक बाल कहानियों का पठन करते हैं, तो उनके जीवन में उत्साह, सदाचार, चरित्र और ईमानदारी का नया सूर्योदय होता है। माता-पिता और गुरुजनों का आदर करना तथा सत्कर्म का मार्ग अपनाना ही मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य है। ईमानदारी से किया गया छोटा सा कार्य भी ईश्वर के दरबार में अनमोल बन जाता है। सत्यता और धैर्य हमें समाज में उच्च स्थान प्रदान करते हैं।